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		<title>تا عشق</title>
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		<updated>2010-09-22T07:51:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:17-030.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-031.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-032.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۲]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگري}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تا عشق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست مي‌دانم:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ حريرِ نرمِ نوازش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگ نيازمندي و ايثار&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ پناهِ امن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ شمايِ بالِ پرستو به‌روي آب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگ‌ي سرودِ آبيِِ باران&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ روانِ رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق آبي‌ست، باري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما حكايتي‌ست ازينگونه زيستن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زين سان كه نسلِ ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين نسلِ خشم و خاطره و خون&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين نسلِ تير خورده&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نيمش درونِ آتش و نيمش درونِ آب.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را شناخته بوديم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را به‌موهبتِ عشقمان به‌خلق از آن‌سان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناختيم كزان پيش ناشناخته مي‌بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را غريب و به تبعيد يافتيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زيبايِ سوگوارِ سيه پوش را به‌حسرتِ انسان شناخيتم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كز قرن جداييِ نادلبخواه، عقيم و ملول بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين‌گونه خواستيم كه انسان مجال و راه به‌سوي حريمِ عشق بيابد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان طلسمِ ديوِ ستم بشكند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تصويرِ وهن و حلقه و زنجير و قفل را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از لوحِ سرنوشتِ خود بزدايد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا اين خدايِ مانده به‌زنجير&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزاديِ سرشتيِ خود را دوباره باز بيابد،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا راه را،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آستانِ عشق بپويد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باري عزيز!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان و عشق را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين‌گونه يافتيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هم نيز در تلاشِ شب و روزمان به‌خاطرِ انسان و عشق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شيرازه‌ي كتابِ جوانيمان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بيش از هزاربرگ، برگِ شقايق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با رشته‌هاي سيمي شلاق‌ها و سوزنِ داغ و درفش، دوخته شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست، مي‌دانم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما عزيز!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر من چنين مبين&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من نسلِ زخمي‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نسلِ شهيد، نسلِ شكنجه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در هركرانِ سينه‌ي من، لاله زارهاست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و باغِ ارغوانِ شقايق كه باد مي‌بَرَدَش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دركوچه‌هاي درهمِ قلبم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هرشام حجله‌هاي پر از چلچراغ‌هاي سيه پوش، مي‌برند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در كوچه‌هاي آبي رگ‌هايم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
طبل، عزا شكفته به‌هرنبض&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در سينه كينه مانده و بانويِ سوگوار كه مي‌مويد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مي‌مويد و به‌زمزمه مي‌گويد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قلبم به‌مهر مي‌تپد و نبضِ من به‌خشم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست، باري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
درخواب‌هاي خستگي و خون،‌هرشب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر مي‌نهم به‌دامنِ ابري آبي:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گهوارِ نرمتابِ رها زير طاقِ طاقيِ رنگين كماننه‌هاي فضاهايِ كودكي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن‌گاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باراني از ستاره‌ي آبي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گلزخم‌هاي گرمِ تنم را به‌مهر مي‌نوازد و مي‌رويد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
روحِ روانِ رود مرا مي‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ناگور، 26 شهريور1357&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نعمت ميرزازاده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(م.آزرم)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پايان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>تا عشق</title>
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		<updated>2010-09-22T07:50:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:17-030.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-031.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-032.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۲]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگري}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تا عشق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست مي‌دانم:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ حريرِ نرمِ نوازش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگ نيازمندي و ايثار&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ پناهِ امن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ شمايِ بالِ پرستو به‌روي آب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگ‌ي سرودِ آبيِِ باران&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ روانِ رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق آبي‌ست، باري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما حكايتي‌ست ازينگونه زيستن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زين سان كه نسلِ ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين نسلِ خشم و خاطره و خون&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين نسلِ تير خورده&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نيمش درونِ آتش و نيمش درونِ آب.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را شناخته بوديم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را به‌موهبتِ عشقمان به‌خلق از آن‌سان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناختيم كزان پيش ناشناخته مي‌بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را غريب و به تبعيد يافتيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زيبايِ سوگوارِ سيه پوش را به‌حسرتِ انسان شناخيتم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كز قرن جداييِ نادلبخواه، عقيم و ملول بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين‌گونه خواستيم كه انسان مجال و راه به‌سوي حريمِ عشق بيابد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان طلسمِ ديوِ ستم بشكند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تصويرِ وهن و حلقه و زنجير و قفل را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از لوحِ سرنوشتِ خود بزدايد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا اين خدايِ مانده به‌زنجير&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزاديِ سرشتيِ خود را دوباره باز بيابد،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا راه را،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آستانِ عشق بپويد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باري عزيز!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان و عشق را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين‌گونه يافتيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هم نيز در تلاشِ شب و روزمان به‌خاطرِ انسان و عشق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شيرازه‌ي كتابِ جوانيمان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بيش از هزاربرگ، برگِ شقايق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با رشته‌هاي سيمي شلاق‌ها و سوزنِ داغ و درفش، دوخته شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست، مي‌دانم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما عزيز!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر من چنين مبين&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من نسلِ زخمي‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نسلِ شهيد، نسلِ شكنجه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در هركرانِ سينه‌ي من، لاله زارهاست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و باغِ ارغوانِ شقايق كه باد مي‌بَرَدَش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دركوچه‌هاي درهمِ قلبم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هرشام حجله‌هاي پر از چلچراغ‌هاي سيه پوش، مي‌برند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در كوچه‌هاي آبي رگ‌هايم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
طبل، عزا شكفته به‌هرنبض&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در سينه كينه مانده و بانويِ سوگوار كه مي‌مويد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مي‌مويد و به‌زمزمه مي‌گويد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قلبم به‌مهر مي‌تپد و نبضِ من به‌خشم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست، باري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
درخواب‌هاي خستگي و خون،‌هرشب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر مي‌نهم به‌دامنِ ابري آبي:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گهوارِ نرمتابِ رها زير طاقِ طاقيِ رنگين كماننه‌هاي فضاهايِ كودكي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن‌گاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باراني از ستاره‌ي آبي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گلزخم‌هاي گرمِ تنم را به‌مهر مي‌نوازد و مي‌رويد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
روحِ روانِ رود مرا مي‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ناگور، 26 شهريور1375&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نعمت ميرزازاده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(م.آزرم)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>تا عشق</title>
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		<updated>2010-09-22T07:48:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:17-030.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-031.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-032.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۲]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{ويرايش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تا عشق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست مي‌دانم:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ حريرِ نرمِ نوازش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگ نيازمندي و ايثار&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ پناهِ امن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ شمايِ بالِ پرستو به‌روي آب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگ‌ي سرودِ آبيِِ باران&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رنگِ روانِ رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق آبي‌ست، باري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما حكايتي‌ست ازينگونه زيستن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زين سان كه نسلِ ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين نسلِ خشم و خاطره و خون&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين نسلِ تير خورده&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نيمش درونِ آتش و نيمش درونِ آب.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را شناخته بوديم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را به‌موهبتِ عشقمان به‌خلق از آن‌سان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناختيم كزان پيش ناشناخته مي‌بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما عشق را غريب و به تبعيد يافتيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زيبايِ سوگوارِ سيه پوش را به‌حسرتِ انسان شناخيتم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كز قرن جداييِ نادلبخواه، عقيم و ملول بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين‌گونه خواستيم كه انسان مجال و راه به‌سوي حريمِ عشق بيابد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان طلسمِ ديوِ ستم بشكند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تصويرِ وهن و حلقه و زنجير و قفل را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از لوحِ سرنوشتِ خود بزدايد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا اين خدايِ مانده به‌زنجير&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزاديِ سرشتيِ خود را دوباره باز بيابد،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا راه را،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آستانِ عشق بپويد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باري عزيز!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انسان و عشق را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اين‌گونه يافتيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هم نيز در تلاشِ شب و روزمان به‌خاطرِ انسان و عشق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شيرازه‌ي كتابِ جوانيمان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بيش از هزاربرگ، برگِ شقايق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با رشته‌هاي سيمي شلاق‌ها و سوزنِ داغ و درفش، دوخته شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست، مي‌دانم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما عزيز!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر من چنين مبين&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من نسلِ زخمي‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نسلِ شهيد، نسلِ شكنجه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در هركرانِ سينه‌ي من، لاله زارهاست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و باغِ ارغوانِ شقايق كه باد مي‌بَرَدَش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دركوچه‌هاي درهمِ قلبم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هرشام حجله‌هاي پر از چلچراغ‌هاي سيه پوش، مي‌برند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در كوچه‌هاي آبي رگ‌هايم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
طبل، عزا شكفته به‌هرنبض&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در سينه كينه مانده و بانويِ سوگوار كه مي‌مويد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مي‌مويد و به‌زمزمه مي‌گويد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قلبم به‌مهر مي‌تپد و نبضِ من به‌خشم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمانِ عشق، آبي‌ست، باري&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
درخواب‌هاي خستگي و خون،‌هرشب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر مي‌نهم به‌دامنِ ابري آبي:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گهوارِ نرمتابِ رها زير طاقِ طاقيِ رنگين كماننه‌هاي فضاهايِ كودكي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن‌گاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باراني از ستاره‌ي آبي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گلزخم‌هاي گرمِ تنم را به‌مهر مي‌نوازد و مي‌رويد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
روحِ روانِ رود مرا مي‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ناگور، 26 شهريور1375&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نعمت ميرزازاده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(م.آزرم)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>سرودهای کار</title>
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		<updated>2010-09-22T06:28:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:17-033.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-034.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-035.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:17-036.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۷ صفحه ۳۶]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگري}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB_%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:17-033.jpg&amp;diff=9708</id>
		<title>بحث پرونده:17-033.jpg</title>
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		<updated>2010-09-22T05:33:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سرود‌هاي كار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمهء احمد كريمي حكاك&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;راه دوزخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;برت وارد Bert Ward&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كارگرِ سفيد پوست &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌زني كه كنارش ايستاده بود گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من از شما بهترم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نيم گزي فروتر از من بِايست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا جهان، غرور مرا ببيند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زنِ سفيد پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌مردِ سياه‌پوستِ كنار دستش گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد از او من از همه بهترم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو نيم گزي پايينِ پايِ من بايست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا خلق بدانند كه زنان را نيز غروري هست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مرد سياه پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌زن سياه‌پوست رو كرد و گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو چرا نيم گزي پايين نمي‌روي؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مرا هم ، آخر، اندك غروري باقي مانده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زنِ سياه پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌مرد دورگه نگاهي افكند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كه مي‌گفت جايِ خود را بشناس&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چرا كه غرور‌ي من نيز بايد حفظ شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
..............................&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بهاي ذغال&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بيل اِبورن Bill Eburn&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
معدن به‌خانه‌ي خودمان مي‌مانست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پايين رفتن از آن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌راحتي هبوطي آني بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ما از شاهرگ اين ايستگاه زيرزميني پايين رفتيم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رفته رفته شاهرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌رگ‌هايي كوچك و كوچكتر از ذغال و سنگ بَدَل شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كه نور افكنِ كلاهِ كارِ ما به‌پيشِ پاي‌مان مي‌نشاند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كرم وار برجداره‌ها مي‌خزيديم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در امعاء زمين فرو مي‌رفتيم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
راه آسان مي‌نمود و بي خطر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چرا كه هنوز غول درخواب بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن كه يك روز، روزي به‌سياهيِ ذغال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بي‌هيچ زحمتي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ستوني شكست و الواري ازسقف فرو افتاد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن‌گاه، همچون ورقي كه بازي‌گوشانه برخانه‌اي ساخته&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از ورق‌هاي بازي فرواندازي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
همه چيز فرو ريخت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...............................&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تاملات يك روز آفتابي در كارگاه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پاتريشيا گوردونPatricia Gordon&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مي‌گويند انساني نيست به‌بند كشيدنِ انسان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بيست سال يا سي، يا براي ابد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ليكن آزاد و دموكراتيك است – يا ما چنين مي‌پنداريم-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌بند كشيدنِ كارگر در اين كشورِ دموكراتيك.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
يك كارگرِ معمولي انساني است آزاد، كه آزادانه داوطلب مي‌شود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تا سي سال هم تقاضاي عفو ندارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بي‌گمان هيچ اجباري درميان نيست، ابدا، اگر اندوهِ بي‌چيزي را بپذيرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما آخر ما هم بنديِ خوردن و آشاميدنيم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وكفش‌هايمان در بندِ نيم تخت است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و دانشِ معجز‌آسايِ امروز نيز عاجز خواهدماند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه كه كارگر به‌ندايِ رهبر خويش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌خيابان بريزد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چرا كه اگر سود كارفرمايان سقوط كند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ديگر اين جهان‌ي دموكراتيك چگونه گِردِ خود خواهد گشت؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس دورانِ محكوميت را با رويي گشاده طي كن، اي كارگر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حتي اگر براي هميشه باشد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و بيهوده لگد به‌بختِ خويش مزن، تو را با مبارزه چه‌كار؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شايد از گرما عرق از سرو رويت فرو ريزد، يا از سرما به‌خود بلرزي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اگر آن‌چه مي‌گويند بكن، بكني!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...................................................&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
ثروت چگونه اندوخته شد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پاتريشيا گوردون&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دلالان به‌ثروت رسيدند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ارغوان‎‌هايِ مرگ، نيكو بر بسيط خاك افشانده شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
خونِ مردمان بر بسيطِ خاك جاري شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ريشه‌ها را سيراب كرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ((مكزيك)) و در ((پرو)) تازيانه بر گرده‌هاي عريان صفير كشيد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و نقره از دلِ‌معدن‎ها به‌در آمد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تازيانه بر گرده‌هاي عريان صفير كشيد&lt;br /&gt;
و نقره دست به‌دست شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و دلالان به‌ثروت رسيدند &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
خوردني‌هاي گوارا و جامه‌هاي فاخر خريدند&lt;br /&gt;
و بهايِ آن‌را دزديدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان از گرسنگي مردند&lt;br /&gt;
و دلالان به‌ثروت رسيدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پايان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB_%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:17-033.jpg&amp;diff=9707</id>
		<title>بحث پرونده:17-033.jpg</title>
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		<updated>2010-09-22T05:08:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;سرود‌هاي كار&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ترجمهء احمد كريمي حكاك&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;راه دوزخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;برت وارد Bert Ward&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كارگرِ سفيد پوست &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌زني كه كنارش ايستاده بود گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من از شما بهترم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نيم گزي فروتر از من بِايست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا جهان، غرور مرا ببيند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زنِ سفيد پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌مردِ سياه‌پوستِ كنار دستش گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد از او من از همه بهترم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو نيم گزي پايينِ پايِ من بايست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا خلق بدانند كه زنان را نيز غروري هست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مرد سياه پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌زن سياه‌پوست رو كرد و گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو چرا نيم گزي پايين نمي‌روي؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مرا هم ، آخر، اندك غروري باقي مانده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زنِ سياه پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌مرد دورگه نگاهي افكند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كه مي‌گفت جايِ خود را بشناس&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چرا كه غرور‌ي من نيز بايد حفظ شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
..............................&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بهاي ذغال&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بيل اِبورن Bill Eburn&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
معدن به‌خانه‌ي خودمان مي‌مانست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پايين رفتن از آن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌راحتي هبوطي آني بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ما از شاهرگ اين ايستگاه زيرزميني پايين رفتيم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رفته رفته شاهرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌رگ‌هايي كوچك و كوچكتر از ذغال و سنگ بَدَل شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كه نور افكنِ كلاهِ كارِ ما به‌پيشِ پاي‌مان مي‌نشاند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كرم وار برجداره‌ها مي‌خزيديم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در امعاء زمين فرو مي‌رفتيم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
راه آسان مي‌نمود و بي خطر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چرا كه هنوز غول درخواب بود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن كه يك روز، روزي به‌سياهيِ ذغال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بي‌هيچ زحمتي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ستوني شكست و الواري ازسقف فرو افتاد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن‌گاه، همچون ورقي كه بازي‌گوشانه برخانه‌اي ساخته&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از ورق‌هاي بازي فرواندازي&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
همه چيز فرو ريخت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...............................&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB_%D9%BE%D8%B1%D9%88%D9%86%D8%AF%D9%87:17-033.jpg&amp;diff=9706</id>
		<title>بحث پرونده:17-033.jpg</title>
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		<updated>2010-09-22T04:50:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: صفحه‌ای جدید با &amp;#039;سرود‌هاي كار ترجمهء احمد كريمي حكاك  &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;راه دوزخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;برت وارد Bert Ward&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;  كارگرِ سفيد پ…&amp;#039; ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;سرود‌هاي كار&lt;br /&gt;
ترجمهء احمد كريمي حكاك&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;راه دوزخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;برت وارد Bert Ward&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كارگرِ سفيد پوست &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌زني كه كنارش ايستاده بود گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من از شما بهترم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نيم گزي فروتر از من بِايست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا جهان، غرور مرا ببيند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زنِ سفيد پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌مردِ سياه‌پوستِ كنار دستش گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد از او من از همه بهترم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو نيم گزي پايينِ پايِ من بايست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا خلق بدانند كه زنان را نيز غروري هست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مرد سياه پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌زن سياه‌پوست رو كرد و گفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو چرا نيم گزي پايين نمي‌روي؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مرا هم ، آخر، اندك غروري باقي مانده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زنِ سياه پوست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌مرد دورگه نگاهي افكند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
كه مي‌گفت جايِ خود را بشناس&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چرا كه غرور‌ي من نيز بايد حفظ شود.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AF%D8%AE%D8%AA%D8%B1%DB%8C_%D8%B1%D8%A7_%D8%AF%D9%88%D8%B3%D8%AA_%D9%85%DB%8C%E2%80%8C%D8%AF%D8%A7%D8%B1%D9%85...&amp;diff=5625</id>
		<title>دختری را دوست می‌دارم...</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AF%D8%AE%D8%AA%D8%B1%DB%8C_%D8%B1%D8%A7_%D8%AF%D9%88%D8%B3%D8%AA_%D9%85%DB%8C%E2%80%8C%D8%AF%D8%A7%D8%B1%D9%85...&amp;diff=5625"/>
		<updated>2010-08-13T14:49:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:6-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۶ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۶ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چندشعر از لطیف هلمت، شاعر بزرگ کُرد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;دختری را دوست می‌دارم...&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دختری را دوست می‌دارم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که مژگانش را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک به‌یک بنشاند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و شهر را پَرچینی کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دختری را دوست می‌دارم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که گیسوانش را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رشته رشته بچیند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ریسمانِ داری بسازد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کیفرِ ستم‌گران را.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آفتاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سرزمینِ من تابوتی نیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که به‌خاکش توان سپرد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زیر فشار چکمه‌ی زنگاری زمان.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سرزمین من بُمبی‌است،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
روزی منفجر خواهد شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آفتاب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رشته رشته تقسیم شود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
میان خانه‌ها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
پایان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AF%D8%AE%D8%AA%D8%B1%DB%8C_%D8%B1%D8%A7_%D8%AF%D9%88%D8%B3%D8%AA_%D9%85%DB%8C%E2%80%8C%D8%AF%D8%A7%D8%B1%D9%85...&amp;diff=5624</id>
		<title>دختری را دوست می‌دارم...</title>
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		<updated>2010-08-13T14:48:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:6-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۶ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۶ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
{{درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چندشعر از لطیف هلمت، شاعر بزرگ کُرد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;دختری را دوست می‌دارم...&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دختری را دوست می‌دارم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که مژگانش را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک به‌یک بنشاند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و شهر را پَرچینی کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دختری را دوست می‌دارم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که گیسوانش را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رشته رشته بچیند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ریسمانِ داری بسازد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کیفرِ ستم‌گران را.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آفتاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سرزمینِ من تابوتی نیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که به‌خاکش توان سپرد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زیر فشار چکمه‌ی زنگاری زمان.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سرزمین من بُمبی‌است،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
روزی منفجر خواهد شد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آفتاب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رشته رشته تقسیم شود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
میان خانه‌ها.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%DA%A9%D8%A7%D8%B1%D8%A8%D8%B1:Parastoo&amp;diff=5419</id>
		<title>کاربر:Parastoo</title>
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		<updated>2010-07-22T14:17:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: /* انجام شود */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== انجام شود ==&lt;br /&gt;
باسلام&lt;br /&gt;
فکر می‌کنم نباید این پیام را اینجا بنویسم ولی واقعیت این است که محل نوشتن صحیح را نمی دانم. مرا ببخشید و پس از خواندن این پیام پاکش کنید.&lt;br /&gt;
توضیحی که لازم دیدم ذکر کنم این است که من مدتی است از یک گرفتگی عظلانی بسیار مزخرف رنج می برم و علت اینکه متن های انتخابی برای تایپ بیشتر (( یک صفحه ای )) هست وجود این درد است که اجازه نمی دهد مدت زیادی پای کامپیوتر بنشینم. و می خواستم بگویم که به شما و کارتان احترام می گذارم و تا آنجایی که بتوانم در خدمتتان هستم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مو فق و شاد باشید&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== انجام شد ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برچسبِ مناسب زدن بر تمام مطالب شماره ۱&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[الگو:پاورقی]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[الگو:نشان]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[الگو:نشانه]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[الگو:پانویس]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== جدول ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کتاب جمعه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| هفته‌نامهٔ سیاست و هنر&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| سردبیر: احمد شاملو&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| با همکاری شورای نویسندگان&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| مکاتبات با صندوق پستی ۱۱۳۲-۱۵ (تهران)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| پخش شهرستان‌ها، تلفن ۸۳۸۸۳۲ (تهران)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| بهای اشتراک&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ۵۰ شماره ۴۰۰۰ ریال&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ۲۵ شماره ۲۲۵۰ ریال&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| که قبلاً دریافت می‌شود&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بها ۱۰۰ ریال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
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		<title>ناگهان</title>
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		<updated>2010-07-21T18:19:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کورودا سابورو Kuroda Saburo به‌سال1919 در Kure به‌دنیا آمده است. در دانشگاه توکیو علم اقتصاد آموخت و پس از اتمام تحصیلات در رادیوی ژاپن به‌کار پرداخت اما اکنون به‌عنوان یک نویسنده آزاد روزگار می‌گذراند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
ناگهان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و من&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برصندلی کهنه و آشنای خود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کنار پنجرهء اتاقم که سکوتی مرگبار دارد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌انتظار نشسته‌ام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هرگز از خود نپرسیده‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که تا چند به‌انتظار نشسته‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و هیچ‌گاه نیز  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌پوچی این انتظار شک نکرده‌ام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پوچی این انتظار از برای چیست:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بدین انتظار سرمی‌کردم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که در جست و جوی چیزی بودم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
واندک اندک همه چیزی در اندیشه‌ام روشنی گرفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باد ملایم در میان بوته‌های خشخاش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ابر بر فراز دودکش‌ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نو‌ای گام‌هائی که بیرون از اتاق من، زیر باران فرو می‌مُرد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و هزاران سیه‌روزی در تمامی عمر.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس آنگاه، همه چیز را دریافتم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو آمدی، دست برشانهء من نهادی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در چهره‌ات غم بود و اندوه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
غم و اندوهی از آن دست که در چهرهء آن پسرک فرانسوی بود!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پایان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
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		<title>ناگهان</title>
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		<updated>2010-07-21T18:18:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کورودا سابورو Kuroda Saburo به‌سال1919 در Kure به‌دنیا آمده است. در دانشگاه توکیو علم اقتصاد آموخت و پس از اتمام تحصیلات در رادیوی ژاپن به‌کار پرداخت اما اکنون به‌عنوان یک نویسنده آزاد روزگار می‌گذراند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
ناگهان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و من&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برصندلی کهنه و آشنای خود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کنار پنجرهء اتاقم که سکوتی مرگبار دارد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌انتظار نشسته‌ام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هرگز از خود نپرسیده‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که تا چند به‌انتظار نشسته‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و هیچ‌گاه نیز  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌پوچی این انتظار شک نکرده‌ام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پوچی این انتظار از برای چیست:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بدین انتظار سرمی‌کردم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که در جست و جوی چیزی بودم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
واندک اندک همه چیزی در اندیشه‌ام روشنی گرفت:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باد ملایم در میان بوته‌های خشخاش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و ابر بر فراز دودکش‌ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نو‌ای گام‌هائی که بیرون از اتاق من، زیر باران فرو می‌مُرد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و هزاران سیه‌روزی در تمامی عمر.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس آنگاه، همه چیز را دریافتم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تو آمدی، دست برشانهء من نهادی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در چهره‌ات غم بود و اندوه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
غم و اندوهی از آن دست که در چهرهء آن پسرک فرانسوی بود!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پایان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فریاد</title>
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		<updated>2010-07-21T16:32:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شعر ژاپن،&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
پس از جنگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
فریاد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمانو تاداشی Amono Tadashi (متولد1909)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زمانی در میان علف‌ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حشره‌ئی پریشان روزگار می‌زیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
خرد‌ترین مخلوق در این دنیای بزرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که در سراسر زندگی از باد می‌هراسید&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و چون خواست که از گزند آن در امان ماند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عرق بر جبین و نفس گرفته حرفه‌ئی &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;( به نظر حفره صحیح بوده است- تایپیست)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; از برای خویش بساخت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و این‌چنین، حفاری، حشرهء دلتنگ سالی به‌طول انجامید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک چند در حفرهء خویش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شادمانه غنود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باد مغربی اما، در این دنیای پهناور&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌نرمی وزیدن گرفت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و اندکی از خس و خاشاک زمین را به‌حفرهء او فرو ریخت،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حشره، غمناک‌ترین آوایش را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این جهان فراخ برآورد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و جاودانه بخفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پایان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فریاد</title>
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		<updated>2010-07-21T16:31:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شعر ژاپن،&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
پس از جنگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
فریاد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمانو تاداشی Amono Tadashi (متولد1909)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زمانی در میان علف‌ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حشره‌ئی پریشان روزگار می‌زیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
خرد‌ترین مخلوق در این دنیای بزرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که در سراسر زندگی از باد می‌هراسید&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و چون خواست که از گزند آن در امان ماند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عرق بر جبین و نفس گرفته حرفه‌ئی &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;( به نظر حفره صحیح بوده است- تایپیست)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; از برای خویش بساخت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و این‌چنین، حفاری، حشرهء دلتنگ سالی به‌طول انجامید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک چند در حفرهء خویش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شادمانه غنود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باد مغربی اما، در این دنیای پهناور&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌نرمی وزیدن گرفت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و اندکی از خس و خاشاک زمین را به‌حفرهء او فرو ریخت،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حشره، غمناک‌ترین آوایش را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این جهان فراخ برآورد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و جاودانه بخفت.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%B1_%D8%AE%D8%A7%DA%A9%D9%90_%D8%AA%D8%A7%D8%B1%DB%8C%DA%A9...&amp;diff=5414</id>
		<title>بر خاکِ تاریک...</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%B1_%D8%AE%D8%A7%DA%A9%D9%90_%D8%AA%D8%A7%D8%B1%DB%8C%DA%A9...&amp;diff=5414"/>
		<updated>2010-07-20T18:44:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:5-063.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۵ صفحه ۶۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۵ صفحه ۶۳]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;برخاکِ تاریک...&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاکِ تاریک شامگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آوازِ بلندِسپیده می‌گذرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(کبوتری&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فریادِ درخت و تشنگی را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا اوج پرواز می‌کند)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سنگین و &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
غریب.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاکِ تاریک شامگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صداهایی دیگر جاری‌ست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(مردی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بازخمی برسینه و دشنه‌ئی در گلوگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شهادت باران را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاک&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
می‌افتد)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاکِ تاریک شامگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آوازِ سرخ سپیده می‌گذرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عزیز ترسه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تابستان 52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;((پایان))&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>بر خاکِ تاریک...</title>
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		<updated>2010-07-20T18:41:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:5-063.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۵ صفحه ۶۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۵ صفحه ۶۳]]&lt;br /&gt;
{{درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;برخاکِ تاریک...&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاکِ تاریک شامگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آوازِ بلندِسپیده می‌گذرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(کبوتری&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فریادِ درخت و تشنگی را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا اوج پرواز می‌کند)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سنگین و &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
       غریب.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاکِ تاریک شامگاه&lt;br /&gt;
صداهایی دیگر جاری‌ست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(مردی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بازخمی برسینه و دشنه‌ئی در گلوگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شهادت باران را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاک&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
می‌افتد)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برخاکِ تاریک شامگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آوازِ سرخ سپیده می‌گذرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عزیز ترسه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تابستان 52&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
((پایان))&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>هستی</title>
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		<updated>2010-07-19T19:24:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تاکانو کیکوئو Takano Kikuo&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(متولد 1927 در جزیره سانو)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اکنون زندگی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تنها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌عبث در انتظارست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در انتظار چیزی که هرگز نخواهد آمد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چیزی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که نمی‌باید به‌انتظارش ماند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عنکبوت آبی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و کمندش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زرافه با گردن درازش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گل سرخ با خارهایش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردم با حرف‌هاشان،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گل آفتابگردان با چهره‌اش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
همه و همه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پریشانند و در انتظار&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مگرنه؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پایان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>هستی</title>
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		<updated>2010-07-19T19:06:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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تاکانو کیکوئو Takano Kikuo&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(متولد 1927 در جزیره سانو)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اکنون زندگی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تنها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌عبث در انتظارست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در انتظار چیزی که هرگز نخواهد آمد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چیزی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که نمی‌باید به‌انتظارش ماند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عنکبوت آبی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و کمندش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زرافه با گردن درازش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گل سرخ با خارهایش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردم با حرف‌هاشان،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گل آفتابگردان با چهره‌اش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
همه و همه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پریشانند و در انتظار&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مگرنه؟&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
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		<title>هستی</title>
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		<updated>2010-07-19T19:03:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تاکانو کیکوئو Takano Kikuo&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(متولد 1927 در جزیره سانو)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اکنون زندگی&lt;br /&gt;
تنها&lt;br /&gt;
به‌عبث در انتظارست&lt;br /&gt;
در انتظار چیزی که هرگز نخواهد آمد&lt;br /&gt;
چیزی&lt;br /&gt;
که نمی‌باید به‌انتظارش ماند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عنکبوت آبی&lt;br /&gt;
و کمندش.&lt;br /&gt;
زرافه با گردن درازش.&lt;br /&gt;
گل سرخ با خارهایش&lt;br /&gt;
مردم با حرف‌هاشان،&lt;br /&gt;
گل آفتابگردان با چهره‌اش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
همه و همه&lt;br /&gt;
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مگرنه؟&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-18T17:16:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-096.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-097.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-098.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-099.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-100.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-101.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-103.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آن نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طریقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانی یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از طریق ارزش‌های سیاسی، اخلاقی، دینی و مانند این‌ها. این ارزش‌ها{ که روبنای جامعه را می‌سازند} همیشه در روبنای ایدئو لوژیکی جامعه همپایه  به‌شمار نمی‌آیند. هرگاه که(در یک اثرهنری) ارزشی از پیش به‌ارزش دیگری غلبه یابد، در این حال تعیین کننده‌ی این غلبه همانا موقعیت‌های ملموس اجتماعی- تاریخی است؛ به‌این معنا که برخی از موقعیت‌ها بهتراز موقعیت‌های دیگر آمال و علائق  طبقه‌ی اجتماعی غالب را بیان می‌کنند. تازمانی که در یک جامعه‌ی معین،((جزئی)) به ((کلی)) غالب است، { به‌عبارت دیگر} تازمانی که یک طبقه‌ی اجتماعی علاقه‌ی خاص یا جزئی خود را به قیمت از میان بردن علاقه‌ی عمومی یا کلیِ تمام آن اجتماع تحمیل می‌کند، چنین جامعه‌ای خواهد کوشید تا این غلبه جزئی به کلی را به‌خودِ هنر هم بکشاند: به‌این صورت که اول وحدت دیالکتیکی جزئی و کلی را درهم می‌شکند؛ بعد سعی می‌کند که غلبه‌ی یک ارزش سیاسی، دینی، یا اقتصادیِ جزئی را به‌آن ارزش والای اثر هنری، (یعنی، به‌ارزش زیبائی شناختی آن) تحمیل کند یا از آن ببُرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این غلبه در جامعه‌ی یونان باستان اتفاق افتاده است. در آن جامعه هنر، علی‌الخصوص تراژدی، به خدمت پولیس(Poisدولت-شهر) کشانده شد؛ و یک هنر سیاسیِ سطح عالی شد. ( افلاطون آن‌گاه که به‌طور کلی شاعران و هنرمندان مقلدی را که دستی زیر بال تربیت سیاسی و مدنی نمی‌کردند از حکومت آرمانی خود کنار می‌گذاشت به‌روشنی بیانگر توقعات جامعه از هنر بود.) جامعه‌ی قرون وسطائی ( اروپا ) هنر را به خدمت دین گرفت، و هنرمند، موافق با ایدئولوژی غالب، مردم و اشیاء را پرتوی از یک واقعیت فراتر از حس، فراتر از جهان دانست. اما در این جوامع، این‌طور بگوئیم که مناسبات میان هنرمند و جامعه شفاف بود. هنرمند که ارزش‌های غالب جامعه‌اش را تعالی می‌بخشید، خود را چون عضوی از اجتماعش بازشناخت. و جامعه نیز خود را درهنری که ارزش‌های خاص او را بیان می‌کرد، بازشناخت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد از رنسانس، مناسبات نو قدرت مناسبات کهنه‌ی فئودالی را به زوال کشاند. طبقه‌ی اجتماعی نویی، یعنی بورژوازی، پیدا شد که قدرتش در درجه‌ی اول به قدرت بالنده‌ی تولید مادی ، به مثابه بیان غلبه‌ی انسان به طبیعت، بسته بود.&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
تولید نه فقط قدرت بورژوازی را به‌طبیعت بلکه بر انسان‌ها هم گسترش داد. تولید از خدمت به‌انسان سرپیچید ( به‌خلاف آن‌چه در یونان باستان بود) و در عوض شروع کرد به‌آن که درخدمت تولید باشد. همین که‌انسان از ((هدف)) بودن افتاد و وسیله شد (استحاله‌ی نیروی کار به‌کالا)، تولید علیه انسان شد. همان‌طور که قلمرو تولید مادی بزرگ‌تر می‌شد، همه چیز، همین‌طورهم هنر، تابع قوانین خشک آن می‌شد ( استحاله‌ی اثر هنری به‌کالا ). تا همان حد که قانون تولید مادی دامنه‌اش دراز می‌شد، (( کالاشدن)) ( reification) هستی انسانی هم شدت می‌یافت. حیات، خصلت ملموس و واقعی و خلاقش را ازدست داد و خصلت مجرد به‌خود گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در جهانی که همه چیز رنگ کمیت به‌خود می‌گیرد و کجرد می‌شود، هنر که عالی‌ترین صورت بیان هرچیز ملموس و کیفی زندگانی انسان است، با آن جهانِ بیگانه شده را تناقض در پیش می‌گیرد و مامن تباهی‌ناپذیر انسانیت می‌شود. بدین ‌گونه؛، هنر و جامعه به‌طور بنیادی ضد‌هم می‌شوند. هنر، که نماینده‌ی انسانیتِ انکار شده است، با جامهاه‌ای که انسانی نیست به ضدیت برمی‌خیزد؛ و جامعه نیز با هنرمندی که از ((کالا شدن)) تن می‌زند و مادام که سعی می‌کند انسانیتش را آشکار کند ضدیت می‌ورزد.&lt;br /&gt;
این موقعیت، از نظر تاریخی، با سبک رمانتیسم پیدا شده است. و از آن زمان به بعد تناقض میان هنر و جامعه حادتر شده است. هنرمندان بزرگ از جامعه بریده‌اند. چنان که از مردم گریزی‌شان پیداست. جامعه‌ی بورژوا از این که هنرمند دست رد به‌سینه‌اش زده جوابش را بافقر، و دیوانگی یا مرگ می‌دهد. پیش از‌که بورژوازی پایه‌های حکومتش را محکم مستقر کند- یعنی، در جامعه‌ی یونان، در قرون وسطی، در دوره‌های[سبک] باروک [Baroque]  در قرن هفدهم با [ سبک ] نئو کلاسیک [ اواسط قرن هجدهم] – هنرمند  آثارش را هماهنگ با جامعه خلق می‌کرد. آنان با رمانتیسم آغاز کردند و بتدریج منزوی و گوشه گیر شدند. خصوصا از نیمه‌ی دوم قرن نوزدهم به‌این طرف.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هنرمند تن به‌این نداد که کارش را باجهانِ مجرد و کمیت شده و پیش پا افتاده‌ی جامعه‌ی بورژوا بیامیزد. هنرمند بی‌آن‌که کاملا به جدایی مغاک‌گونه‌اش از جامعه‌ی بورژوا آگاه باشد از بنیاد با آن جامعه از درِ مخالفت درآمد و تنها از این راه به اراده‌ی خلاق خود وفادار ماند. آفرینش ( هنری ) وعنای عصیان به خود گرفت. و هرچه هستی انسان بی‌ارزش‌تر شود و غنای حقیقیش را از او بدزدند، هنرمند همن نیاز به‌بیان غنای انسانی او را در یک موضوع واقعی – حسی، و بیرون از نهادهای اجتماعی و هنریِ غالب، حس می‌کند.&lt;br /&gt;
هنر جدید، در قهرمانی‌ترین لحظاتش، کوششی است به‌گریز از ((کالاشدنِ)) هستی.&lt;br /&gt;
همان کوششی که پرولتاریا با وسائل دیگری می‌کند تا در مبارزه‌اش از((بیگانگی)) خلاص شود. [ نک کتب جمعه، 1و2، مقاله‌ی بیگانگی] هنرمندِ ((ملعون)) اواخر قرن نوزدهم و اوایل قرن بیستم، از آن‌رو ملعون است که با بیان فعالیت خلاقش در برابر جهان بی‌تحرک و مجرد بورژوازی ایستادگی و مداومت کرده ‌است. هنرمند با عینیت دادن خود، با خلق چیزهای انسانی و انسانیت یافته، یعنی آثار هنری، حضور انسانی را در چیزها تضمین می‌کند و بدین‌سان در ممانعت از ((کالا شدنِ)) انسانیت یاری می‌کند. بدین گونه هدف والای هنر، نیاز به‌آن و دلیل وجودی آن، قاطع‌تر ازپیش می‌شود، چون در جهانی که معیارهای کمی (ارزش مبادله‌ای) و بیگانگی انسان برآن حکومت می‌کند، [در چنین جهانی] هنر، که آفرینش، بیان، و عینیت انسان است، یکی از با ارزش‌ترین وسائلی می‌سود که[هنرمند] با آن غنای واقعی انسان را احیا می‌کند، باز می‌گوید، و گسترش می‌دهد. هنر هرگز ضروری‌تر از این نبوده، چون هرگز انسان را ناانسانی شدن تهدید نمی‌کرده است. &lt;br /&gt;
در چند دهه‌ی اخیر پیرامون مفهوم (( از انسانیت تهی شدن هنر)) بحث‌ها درگرفته است، و این بحث را خوزه اُرتگای گاست (Jose Ortegay Gasset) پیش کشیده است. اما این بحث به (( از انسانیت تهی شدن انسان)) توجه نکرده است. یعنی چون یک فرآیند خاص جامعه‌ی بورژوا که به‌وسیله‌ی آن انسان، تحت حکوکتِ تولید اضافی، به مقام یک وسیله، شیء، یا یک کالا کشانده شده، توجه نکرده است. و این را هم باز نشناخته‌اندکه این ((از انسانیت تهی شدنِ)) فرضی هنرپاسخی بود( که برای خود هنر خالی از خطر نبود) به ((از انسانیت تهی شدن)) خودِ انسان. اگرچه این خطرات آشکار بود. هنرمند مجبور بود آن‌ها را با آن شرایط جزئی بپذیرد، یعنی شرایطی که وظیفه‌ی حفظ و حراست آن‌چه را انسانی و ملموس[مقابل مجرد] است احاطه کرده‌اند. بدین سان هنرمند جدید وظیفه‌ای را به‌عهده می‌گرفت که نیروهایش برای آن کافی نبود، زیرا فتح مجدد انسان ملموس، تایید انسان در یک جهانِ بیگانه شده، کاری نبود که با هنرِ تنها انجام بگیرد.&lt;br /&gt;
هنرمند علیه جامعه‌ای که قانون تولید مادی برآن حکم می‌رند واکنش نشان داده است؛ او آن‌قانون را شکسته و از کار خلاقش گِرد خود باروئی بر‌آورده است. او آزادیش را این چنین بیان می‌کرد، اما همچون ثمره‌ی ضرورت. هنرمند راه دیگری جز شکستن قوانین نداشت؛ این تنها راهی بود که او می‌توانست هنرمند باقی بماند. خصومت جامعه او را به‌طغیان واداشت: پس اگرچه او به‌منظور حفظ آزادی خلاقش علم طغیان برافراشته، اما سرچشمه‌های این روحیه‌ی او اساسا اجتماعی است. جامعه‌ی جدید تنها جامعه‌ای بوده است که آفرینش هنری را به‌چنان جلوه‎ی قهرمانانه‌ای می‌آراید که ما در حیات خلاق وان گوگ آدمی با یک مودیلیائی می‌یابیم، چرا که فقط در جامعه‌ی جدید است که هنرمند پی‌می‌برد که در نتیجه‌ی استحاله‌ی اثرهنری به یک شیء ؛ مغاک هولناکی زیر پایش دهان بازکرده است. او با این ادراک توانسته است خود را، چون یمک هنرمند و چون یک انسان، تایید و اثبات کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما در حالی که خود را اثبات کرده جنبه‌های حیاتی معینی از خود هنر را نیز به‌خطر انداخته است: فواصل را طولانی کرده، بند‌ها را گسسته، و پل‌ها را درهم کوفته است. او کار را تقریبا تا به‌آن‌جا رسانده که آن‌چه را در ذات او به او تعلق دارد، یعنی قابلیت ارتباطش را ، درهم شکسته است. هنر توانسته است با خلاص شدن از یک جامعه‌ی پیش پا افتاده، یعنی از یک جهان تهی شده از انسانیت و مجرد از آن رو بگرداند، و (بدین‌گونه) در محاصره افتاده است. هنر برای حفظ ذات خلاقش چنین بهای وحشتناکی به جامعه بورژوا پرداخته است. و اکنون باید در این یاری جانِ دوباره بدمد، بدین گونه که آن ارتباط رها شده را از نو برقرا ر کند، و پل‌های فروریخته‌ی میان هنرمند و مردم را از ن بسازد. این کار را نمی‌توان با خرید یک فهم آسان‌گیر به قیمت بی‌بها کردن مضاعف انجام داد: یعنی، با بی بها کردن اثر هنری و بیننده‌ی اثر هردو. این ارتباط را فقط می‌توان هم با بالا بردن کیفیت اثر هنری و هم حساسیت نهری مردم( هنر پسندان) حفظ کرد. برا یاین منظور باید پل‌های نوی ساخت، زیرا اگر بنا باشد که آفرینش هنری خود را از این (( من گرائی)) نجات دهد ( که بخش بزرگی از آفرینش هنری بدان درافتاده) وجود این پل‌ها لازم است.&lt;br /&gt;
هنرمند حقیقی توانائی آن‌را دارد که زبان نوی خلق کند که زبان معمولی در ا« مقام ناکام بماند. چیزی که او می‌آفریند به‌خودی خود، هدف نیست، به عکس، وسیله‌ی رسیدن به‌مردم است. هنر حقیق جنبه‌های ذاتی هستی انسان را به طریقی آشکار می‌کند که شاید میان همه مشترک باشد. پس، هنری که به‌کار ارتباط یافتن نمی‌آید نفی جنبه‌ی ذاتی هنر است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هنر جدید که بند‌هایش را از یک جهان مجرد بورژوا ( که این ذات خلاق هنر را می‌آزارد) بریده باید پیوندهای نوی با مردم ببندد. این جست‌و‌جو باید از هردو جانب باشد. زیرا مردم هم باید جویای هنر باشند، و بدین‌گونه باید هنر را در نیمه راه این جستجو ببینند. بدین‌سان ، در حالی که هنرمند به‌دنبال وسیله‌ی بیان می‌گردد که این ارتباط را ممکن کند، مردم هم باید به‌دنبال هنر بگردند و از شبه هنرِ یک جهان بازاری شده (reified)   و بی ارزش دست بکشند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در هر دو مورد این این مشکل را نمی‌توان در یک سطح صرفا زیبائی شناختی حل کرد. آن ارتباطی که هنرمند در پی آن است فقط وقتی می‌تواند حاصل شود که دیگر محیط، در نظراو، یکسره خصمانه نباشد، جهان مجردی نباشد که فقط می‌تواند آفرینش هنری را بخشکاند. در آن معنا، مشکل ارتباط هنری از مشکلِ دیگر، یعنی یافتنِ ارتباط واقعی در میان انسان‌ها، جدائی ناپذیر است. هنر سرنوشتش را با آن نیروی اجتماعی قسمت می‌کند که در راه‌حل تناقضات میان اجتماع حقیقی و فردیت مبارزه می‌کنند( یعنی، تناقضاتی که هم جامعه را از هم می‌دَرَد و هم فرد را). پس، طغیان قهرمانانه‌ی هنرمند جدید دیگر نباید دارای همان خصلت مخالف خوان و گستاخی باشد که در آغاز داشت، یعنی خصلت زمانی را که در او به‌چشم یک مطرود [جامعه‌ی بورژوا] می‌نگریستند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از سوی دیگر، مردم نمی‌توانند فعالانه جویای هنر حقیقی باشند مگر آن‌که خود را از چنگ شبه‌ی هنر جهان انسانیِ بیگانه شده خلاص کنند. زیرا که وجود این هنر ارزان و دروغین در درجه‌ی اول طفیلی نیروهای اقتصادی و صنعتی نیرومند‌ی است رواج آن‌را تضمین می‌کنند. وچون این نیروها در دست آن عناصر اجتماعی است که نفعشان صددرصد در حفظ آن جهان مجرد و بازاری شده است، بنابراین رهائی مردم، قلمرو اختصاصی هنرمندان و استادان زیبائی شناسی نیست. چه این رهائی از آزادی اجتماعی جامعه، چون یک کل تفکیک ناپذیر است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و بدین گونه سرنوشت ‌های هنر و جامعه یک‌بار دیگر به گونه‌ای باهم یگانه می‌شوند که برای هردو نقش تعیین کننده خواهد داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پایان&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB_%DA%A9%D8%A7%D8%B1%D8%A8%D8%B1:Sadeghsadeghi&amp;diff=5408</id>
		<title>بحث کاربر:Sadeghsadeghi</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%A8%D8%AD%D8%AB_%DA%A9%D8%A7%D8%B1%D8%A8%D8%B1:Sadeghsadeghi&amp;diff=5408"/>
		<updated>2010-07-17T09:19:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;سلام. خسته نباشید. خیلی زیاد ممنون از همکاری‌تان در تایپِ مطالب. --[[کاربر:Parastoo|پرستو]] ‏۱۴ ژوئیهٔ ۲۰۱۰، ساعت ۱۱:۰۵ (UTC)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سلام. از شما متشکرم که این کار مفید را بانی و باعث شدید.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AF%D8%B1_%D8%A8%D8%A7%D8%A8_%D9%87%D9%86%D8%B1_%D9%88_%D8%AC%D8%A7%D9%85%D8%B9%D9%87&amp;diff=5407</id>
		<title>در باب هنر و جامعه</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AF%D8%B1_%D8%A8%D8%A7%D8%A8_%D9%87%D9%86%D8%B1_%D9%88_%D8%AC%D8%A7%D9%85%D8%B9%D9%87&amp;diff=5407"/>
		<updated>2010-07-17T09:14:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-096.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-097.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-098.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-099.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-100.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-101.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-103.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از طریق ارزش‌های سیاسی، اخلاقی، دینی و مانند این‌ها. این ارزش‌ها{ که روبنای جامعه را می‌سازند} همیشه در روبنای ایدئو لوژیکی جامعه همپایه  به‌شمار نمی‌آیند. هرگاه که(در یک اثرهنری) ارزشی از پیش به‌ارزش دیگری غلبه یابد، در این حال تعیین کننده‌ی این غلبه همانا موقعیت‌های ملموس اجتماعی- تاریخی است؛ به‌این معنا که برخی از موقعیت‌ها بهتراز موقعیت‌های دیگر آمال و علائق  طبقه‌ی اجتماعی غالب را بیان می‌کنند. تازمانی که در یک جامعه‌ی معین،((جزئی)) به ((کلی)) غالب است، { به‌عبارت دیگر} تازمانی که یک طبقه‌ی اجتماعی علاقه‌ی خاص یا جزئی خود را به قیمت از میان بردن علاقه‌ی عمومی یا کلیِ تمام آن اجتماع تحمیل می‌کند، چنین جامعه‌ای خواهد کوشید تا این غلبه جزئی به کلی را به‌خودِ هنر هم بکشاند: به‌این صورت که اول وحدت دیالکتیکی جزئی و کلی را درهم می‌شکند؛ بعد سعی می‌کند که غلبه‌ی یک ارزش سیاسی، دینی، یا اقتصادیِ جزئی را به‌آن ارزش والای اثر هنری، (یعنی، به‌ارزش زیبائی شناختی آن) تحمیل کند یا از آن ببُرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این غلبه در جامعه‌ی یونان باستان اتفاق افتاده است. در آن جامعه هنر، علی‌الخصوص تراژدی، به خدمت پولیس(Poisدولت-شهر) کشانده شد؛ و یک هنر سیاسیِ سطح عالی شد. ( افلاطون آن‌گاه که به‌طور کلی شاعران و هنرمندان مقلدی را که دستی زیر بال تربیت سیاسی و مدنی نمی‌کردند از حکومت آرمانی خود کنار می‌گذاشت به‌روشنی بیانگر توقعات جامعه از هنر بود.) جامعه‌ی قرون وسطائی ( اروپا ) هنر را به خدمت دین گرفت، و هنرمند، موافق با ایدئولوژی غالب، مردم و اشیاء را پرتوی از یک واقعیت فراتر از حس، فراتر از جهان دانست. اما در این جوامع، این‌طور بگوئیم که مناسبات میان هنرمند و جامعه شفاف بود. هنرمند که ارزش‌های غالب جامعه‌اش را تعالی می‌بخشید، خود را چون عضوی از اجتماعش بازشناخت. و جامعه نیز خود را درهنری که ارزش‌های خاص او را بیان می‌کرد، بازشناخت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بعد از رنسانس، مناسبات نو قدرت مناسبات کهنه‌ی فئودالی را به زوال کشاند. طبقه‌ی اجتماعی نویی، یعنی بورژوازی، پیدا شد که قدرتش در درجه‌ی اول به قدرت بالنده‌ی تولید مادی ، به مثابه بیان غلبه‌ی انسان به طبیعت، بسته بود.&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
تولید نه فقط قدرت بورژوازی را به‌طبیعت بلکه بر انسان‌ها هم گسترش داد. تولید از خدمت به‌انسان سرپیچید ( به‌خلاف آن‌چه در یونان باستان بود) و در عوض شروع کرد به‌آن که درخدمت تولید باشد. همین که‌انسان از ((هدف)) بودن افتاد و وسیله شد (استحاله‌ی نیروی کار به‌کالا)، تولید علیه انسان شد. همان‌طور که قلمرو تولید مادی بزرگ‌تر می‌شد، همه چیز، همین‌طورهم هنر، تابع قوانین خشک آن می‌شد ( استحاله‌ی اثر هنری به‌کالا ). تا همان حد که قانون تولید مادی دامنه‌اش دراز می‌شد، (( کالاشدن)) ( reification) هستی انسانی هم شدت می‌یافت. حیات، خصلت ملموس و واقعی و خلاقش را ازدست داد و خصلت مجرد به‌خود گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در جهانی که همه چیز رنگ کمیت به‌خود می‌گیرد و کجرد می‌شود، هنر که عالی‌ترین صورت بیان هرچیز ملموس و کیفی زندگانی انسان است، با آن جهانِ بیگانه شده را تناقض در پیش می‌گیرد و مامن تباهی‌ناپذیر انسانیت می‌شود. بدین ‌گونه؛، هنر و جامعه به‌طور بنیادی ضد‌هم می‌شوند. هنر، که نماینده‌ی انسانیتِ انکار شده است، با جامهاه‌ای که انسانی نیست به ضدیت برمی‌خیزد؛ و جامعه نیز با هنرمندی که از ((کالا شدن)) تن می‌زند و مادام که سعی می‌کند انسانیتش را آشکار کند ضدیت می‌ورزد.&lt;br /&gt;
این موقعیت، از نظر تاریخی، با سبک رمانتیسم پیدا شده است. و از آن زمان به بعد تناقض میان هنر و جامعه حادتر شده است. هنرمندان بزرگ از جامعه بریده‌اند. چنان که از مردم گریزی‌شان پیداست. جامعه‌ی بورژوا از این که هنرمند دست رد به‌سینه‌اش زده جوابش را بافقر، و دیوانگی یا مرگ می‌دهد. پیش از‌که بورژوازی پایه‌های حکومتش را محکم مستقر کند- یعنی، در جامعه‌ی یونان، در قرون وسطی، در دوره‌های[سبک] باروک [Baroque]  در قرن هفدهم با [ سبک ] نئو کلاسیک [ اواسط قرن هجدهم] – هنرمند  آثارش را هماهنگ با جامعه خلق می‌کرد. آنان با رمانتیسم آغاز کردند و بتدریج منزوی و گوشه گیر شدند. خصوصا از نیمه‌ی دوم قرن نوزدهم به‌این طرف.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هنرمند تن به‌این نداد که کارش را باجهانِ مجرد و کمیت شده و پیش پا افتاده‌ی جامعه‌ی بورژوا بیامیزد. هنرمند بی‌آن‌که کاملا به جدایی مغاک‌گونه‌اش از جامعه‌ی بورژوا آگاه باشد از بنیاد با آن جامعه از درِ مخالفت درآمد و تنها از این راه به اراده‌ی خلاق خود وفادار ماند. آفرینش ( هنری ) وعنای عصیان به خود گرفت. و هرچه هستی انسان بی‌ارزش‌تر شود و غنای حقیقیش را از او بدزدند، هنرمند همن نیاز به‌بیان غنای انسانی او را در یک موضوع واقعی – حسی، و بیرون از نهادهای اجتماعی و هنریِ غالب، حس می‌کند.&lt;br /&gt;
هنر جدید، در قهرمانی‌ترین لحظاتش، کوششی است به‌گریز از ((کالاشدنِ)) هستی.&lt;br /&gt;
همان کوششی که پرولتاریا با وسائل دیگری می‌کند تا در مبارزه‌اش از((بیگانگی)) خلاص شود. [ نک کتب جمعه، 1و2، مقاله‌ی بیگانگی] هنرمندِ ((ملعون)) اواخر قرن نوزدهم و اوایل قرن بیستم، از آن‌رو ملعون است که با بیان فعالیت خلاقش در برابر جهان بی‌تحرک و مجرد بورژوازی ایستادگی و مداومت کرده ‌است. هنرمند با عینیت دادن خود، با خلق چیزهای انسانی و انسانیت یافته، یعنی آثار هنری، حضور انسانی را در چیزها تضمین می‌کند و بدین‌سان در ممانعت از ((کالا شدنِ)) انسانیت یاری می‌کند. بدین گونه هدف والای هنر، نیاز به‌آن و دلیل وجودی آن، قاطع‌تر ازپیش می‌شود، چون در جهانی که معیارهای کمی (ارزش مبادله‌ای) و بیگتنگیانسان برآن حکومت می‌کند، [در چنین جهانی] هنر، که آفرینش، بیان، و عینیت انسان است، یکی از با ارزش‌ترین وسائلی می‌سود که[هنرمند] با آن غنای واقعی انسان را احیا می‌کند، باز می‌گوید، و گسترش می‌دهد. هنر هرگز ضروری‌تر از این نبوده، چون هرگز انسان را ناانسانی شدن تهدید نمی‌کرده است. &lt;br /&gt;
در چند دهه‌ی اخیر پیرامون مفهوم (( از انسانیت تهی شدن هنر)) بحث‌ها درگرفته است، و این بحث را خوزه اُرتگای گاست (Jose Ortegay Gasset) پیش کشیده است. اما این بحث به (( از انسانیت تهی شدن انسان)) توجه نکرده است. یعنی چون یک فرآیند خاص جامعه‌ی بورژوا که به‌وسیله‌ی آن انسان، تحت حکوکتِ تولید اضافی، به مقام یک وسیله، شیء، یا یک کالا کشانده شده، توجه نکرده است. و این را هم باز نشناخته‌اندکه این ((از انسانیت تهی شدنِ)) فرضی هنرپاسخی بود( که برای خود هنر خالی از خطر نبود) به ((از انسانیت تهی شدن)) خودِ انسان. اگرچه این خطرات آشکار بود. هنرمند مجبور بود آن‌ها را با آن شرایط جزئی بپذیرد، یعنی شرایطی که وظیفه‌ی حفظ و حراست آن‌چه را انسانی و ملموس[مقابل مجرد] است احاطه کرده‌اند. بدین سان هنرمند جدید وظیفه‌ای را به‌عهده می‌گرفت که نیروهایش برای آن کافی نبود، زیرا فتح مجدد انسان ملموس، تایید انسان در یک جهانِ بیگانه شده، کاری نبود که با هنرِ تنها انجام بگیرد.&lt;br /&gt;
هنرمند علیه جامعه‌ای که قانون تولید مادی برآن حکم می‌رند واکنش نشان داده است؛ او آن‌قانون را شکسته و از کار خلاقش گِرد خود باروئی بر‌آورده است. او آزادیش را این چنین بیان می‌کرد، اما همچون ثمره‌ی ضرورت. هنرمند راه دیگری جز شکستن قوانین نداشت؛ این تنها راهی بود که او می‌توانست هنرمند باقی بماند. خصومت جامعه او را به‌طغیان واداشت: پس اگرچه او به‌منظور حفظ آزادی خلاقش علم طغیان برافراشته، اما سرچشمه‌های این روحیه‌ی او اساسا اجتماعی است. جامعه‌ی جدید تنها جامعه‌ای بوده است که آفرینش هنری را به‌چنان جلوه‎ی قهرمانانه‌ای می‌آراید که ما در حیات خلاق وان گوگ آدمی با یک مودیلیائی می‌یابیم، چرا که فقط در جامعه‌ی جدید است که هنرمند پی‌می‌برد که در نتیجه‌ی استحاله‌ی اثرهنری به یک شیء ؛ مغاک هولناکی زیر پایش دهان بازکرده است. او با این ادراک توانسته است خود را، چون یمک هنرمند و چون یک انسان، تایید و اثبات کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما در حالی که خود را اثبات کرده جنبه‌های حیاتی معینی از خود هنر را نیز به‌خطر انداخته است: فواصل را طولانی کرده، بند‌ها را گسسته، و پل‌ها را درهم کوفته است. او کار را تقریبا تا به‌آن‌جا رسانده که آن‌چه را در ذات او به او تعلق دارد، یعنی قابلیت ارتباطش را ، درهم شکسته است. هنر توانسته است با خلاص شدن از یک جامعه‌ی پیش پا افتاده، یعنی از یک جهان تهی شده از انسانیت و مجرد از آن رو بگرداند، و (بدین‌گونه) در محاصره افتاده است. هنر برای حفظ ذات خلاقش چنین بهای وحشتناکی به جامعه بورژوا پرداخته است. و اکنون باید در این یاری جانِ دوباره بدمد، بدین گونه که آن ارتباط رها شده را از نو برقرا ر کند، و پل‌های فروریخته‌ی میان هنرمند و مردم را از ن بسازد. این کار را نمی‌توان با خرید یک فهم آسان‌گیر به قیمت بی‌بها کردن مضاعف انجام داد: یعنی، با بی بها کردن اثر هنری و بیننده‌ی اثر هردو. این ارتباط را فقط می‌توان هم با بالا بردن کیفیت اثر هنری و هم حساسیت نهری مردم( هنر پسندان) حفظ کرد. برا یاین منظور باید پل‌های نوی ساخت، زیرا اگر بنا باشد که آفرینش هنری خود را از این (( من گرائی)) نجات دهد ( که بخش بزرگی از آفرینش هنری بدان درافتاده) وجود این پل‌ها لازم است.&lt;br /&gt;
هنرمند حقیقی توانائی آن‌را دارد که زبان نوی خلق کند که زبان معمولی در ا« مقام ناکام بماند. چیزی که او می‌آفریند به‌خودی خود، هدف نیست، به عکس، وسیله‌ی رسیدن به‌مردم است. هنر حقیق جنبه‌های ذاتی هستی انسان را به طریقی آشکار می‌کند که شاید میان همه مشترک باشد. پس، هنری که به‌کار ارتباط یافتن نمی‌آید نفی جنبه‌ی ذاتی هنر است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هنر جدید که بند‌هایش را از یک جهان مجرد بورژوا ( که این ذات خلاق هنر را می‌آزارد) بریده باید پیوندهای نوی با مردم ببندد. این جست‌و‌جو باید از هردو جانب باشد. زیرا مردم هم باید جویای هنر باشند، و بدین‌گونه باید هنر را در نیمه راه این جستجو ببینند. بدین‌سان ، در حالی که هنرمند به‌دنبال وسیله‌ی بیان می‌گردد که این ارتباط را ممکن کند، مردم هم باید به‌دنبال هنر بگردند و از شبه هنرِ یک جهان بازاری شده (reified)   و بی ارزش دست بکشند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در هر دو مورد این این مشکل را نمی‌توان در یک سطح صرفا زیبائی شناختی حل کرد. آن ارتباطی که هنرمند در پی آن است فقط وقتی می‌تواند حاصل شود که دیگر محیط، در نظراو، یکسره خصمانه نباشد، جهان مجردی نباشد که فقط می‌تواند آفرینش هنری را بخشکاند. در آن معنا، مشکل ارتباط هنری از مشکلِ دیگر، یعنی یافتنِ ارتباط واقعی در میان انسان‌ها، جدائی ناپذیر است. هنر سرنوشتش را با آن نیروی اجتماعی قسمت می‌کند که در راه‌حل تناقضات میان اجتماع حقیقی و فردیت مبارزه می‌کنند( یعنی، تناقضاتی که هم جامعه را از هم می‌دَرَد و هم فرد را). پس، طغیان قهرمانانه‌ی هنرمند جدید دیگر نباید دارای همان خصلت مخالف خوان و گستاخی باشد که در آغاز داشت، یعنی خصلت زمانی را که در او به‌چشم یک مطرود [جامعه‌ی بورژوا] می‌نگریستند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از سوی دیگر، مردم نمی‌توانند فعالانه جویای هنر حقیقی باشند مگر آن‌که خود را از چنگ شبه‌ی هنر جهان انسانیِ بیگانه شده خلاص کنند. زیرا که وجود این هنر ارزان و دروغین در درجه‌ی اول طفیلی نیروهای اقتصادی و صنعتی نیرومند‌ی است رواج آن‌را تضمین می‌کنند. وچون این نیروها در دست آن عناصر اجتماعی است که نفعشان صددرصد در حفظ آن جهان مجرد و بازاری شده است، بنابراین رهائی مردم، قلمرو اختصاصی هنرمندان و استادان زیبائی شناسی نیست. چه این رهائی از آزادی اجتماعی جامعه، چون یک کل تفکیک ناپذیر است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و بدین گونه سرنوشت ‌های هنر و جامعه یک‌بار دیگر به گونه‌ای باهم یگانه می‌شوند که برای هردو نقش تعیین کننده خواهد داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پایان&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-17T09:11:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-096.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-097.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-098.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-099.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-100.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-101.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-103.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از طریق ارزش‌های سیاسی، اخلاقی، دینی و مانند این‌ها. این ارزش‌ها{ که روبنای جامعه را می‌سازند} همیشه در روبنای ایدئو لوژیکی جامعه همپایه  به‌شمار نمی‌آیند. هرگاه که(در یک اثرهنری) ارزشی از پیش به‌ارزش دیگری غلبه یابد، در این حال تعیین کننده‌ی این غلبه همانا موقعیت‌های ملموس اجتماعی- تاریخی است؛ به‌این معنا که برخی از موقعیت‌ها بهتراز موقعیت‌های دیگر آمال و علائق  طبقه‌ی اجتماعی غالب را بیان می‌کنند. تازمانی که در یک جامعه‌ی معین،((جزئی)) به ((کلی)) غالب است، { به‌عبارت دیگر} تازمانی که یک طبقه‌ی اجتماعی علاقه‌ی خاص یا جزئی خود را به قیمت از میان بردن علاقه‌ی عمومی یا کلیِ تمام آن اجتماع تحمیل می‌کند، چنین جامعه‌ای خواهد کوشید تا این غلبه جزئی به کلی را به‌خودِ هنر هم بکشاند: به‌این صورت که اول وحدت دیالکتیکی جزئی و کلی را درهم می‌شکند؛ بعد سعی می‌کند که غلبه‌ی یک ارزش سیاسی، دینی، یا اقتصادیِ جزئی را به‌آن ارزش والای اثر هنری، (یعنی، به‌ارزش زیبائی شناختی آن) تحمیل کند یا از آن ببُرد.&lt;br /&gt;
این غلبه در جامعه‌ی یونان باستان اتفاق افتاده است. در آن جامعه هنر، علی‌الخصوص تراژدی، به خدمت پولیس(Poisدولت-شهر) کشانده شد؛ و یک هنر سیاسیِ سطح عالی شد. ( افلاطون آن‌گاه که به‌طور کلی شاعران و هنرمندان مقلدی را که دستی زیر بال تربیت سیاسی و مدنی نمی‌کردند از حکومت آرمانی خود کنار می‌گذاشت به‌روشنی بیانگر توقعات جامعه از هنر بود.) جامعه‌ی قرون وسطائی ( اروپا ) هنر را به خدمت دین گرفت، و هنرمند، موافق با ایدئولوژی غالب، مردم و اشیاء را پرتوی از یک واقعیت فراتر از حس، فراتر از جهان دانست. اما در این جوامع، این‌طور بگوئیم که مناسبات میان هنرمند و جامعه شفاف بود. هنرمند که ارزش‌های غالب جامعه‌اش را تعالی می‌بخشید، خود را چون عضوی از اجتماعش بازشناخت. و جامعه نیز خود را درهنری که ارزش‌های خاص او را بیان می‌کرد، بازشناخت.&lt;br /&gt;
بعد از رنسانس، مناسبات نو قدرت مناسبات کهنه‌ی فئودالی را به زوال کشاند. طبقه‌ی اجتماعی نویی، یعنی بورژوازی، پیدا شد که قدرتش در درجه‌ی اول به قدرت بالنده‌ی تولید مادی ، به مثابه بیان غلبه‌ی انسان به طبیعت، بسته بود. &lt;br /&gt;
تولید نه فقط قدرت بورژوازی را به‌طبیعت بلکه بر انسان‌ها هم گسترش داد. تولید از خدمت به‌انسان سرپیچید ( به‌خلاف آن‌چه در یونان باستان بود) و در عوض شروع کرد به‌آن که درخدمت تولید باشد. همین که‌انسان از ((هدف)) بودن افتاد و وسیله شد (استحاله‌ی نیروی کار به‌کالا)، تولید علیه انسان شد. همان‌طور که قلمرو تولید مادی بزرگ‌تر می‌شد، همه چیز، همین‌طورهم هنر، تابع قوانین خشک آن می‌شد ( استحاله‌ی اثر هنری به‌کالا ). تا همان حد که قانون تولید مادی دامنه‌اش دراز می‌شد، (( کالاشدن)) ( reification) هستی انسانی هم شدت می‌یافت. حیات، خصلت ملموس و واقعی و خلاقش را ازدست داد و خصلت مجرد به‌خود گرفت.&lt;br /&gt;
در جهانی که همه چیز رنگ کمیت به‌خود می‌گیرد و کجرد می‌شود، هنر که عالی‌ترین صورت بیان هرچیز ملموس و کیفی زندگانی انسان است، با آن جهانِ بیگانه شده را تناقض در پیش می‌گیرد و مامن تباهی‌ناپذیر انسانیت می‌شود. بدین ‌گونه؛، هنر و جامعه به‌طور بنیادی ضد‌هم می‌شوند. هنر، که نماینده‌ی انسانیتِ انکار شده است، با جامهاه‌ای که انسانی نیست به ضدیت برمی‌خیزد؛ و جامعه نیز با هنرمندی که از ((کالا شدن)) تن می‌زند و مادام که سعی می‌کند انسانیتش را آشکار کند ضدیت می‌ورزد.&lt;br /&gt;
این موقعیت، از نظر تاریخی، با سبک رمانتیسم پیدا شده است. و از آن زمان به بعد تناقض میان هنر و جامعه حادتر شده است. هنرمندان بزرگ از جامعه بریده‌اند. چنان که از مردم گریزی‌شان پیداست. جامعه‌ی بورژوا از این که هنرمند دست رد به‌سینه‌اش زده جوابش را بافقر، و دیوانگی یا مرگ می‌دهد. پیش از‌که بورژوازی پایه‌های حکومتش را محکم مستقر کند- یعنی، در جامعه‌ی یونان، در قرون وسطی، در دوره‌های[سبک] باروک [Baroque]  در قرن هفدهم با [ سبک ] نئو کلاسیک [ اواسط قرن هجدهم] – هنرمند  آثارش را هماهنگ با جامعه خلق می‌کرد. آنان با رمانتیسم آغاز کردند و بتدریج منزوی و گوشه گیر شدند. خصوصا از نیمه‌ی دوم قرن نوزدهم به‌این طرف.&lt;br /&gt;
هنرمند تن به‌این نداد که کارش را باجهانِ مجرد و کمیت شده و پیش پا افتاده‌ی جامعه‌ی بورژوا بیامیزد. هنرمند بی‌آن‌که کاملا به جدایی مغاک‌گونه‌اش از جامعه‌ی بورژوا آگاه باشد از بنیاد با آن جامعه از درِ مخالفت درآمد و تنها از این راه به اراده‌ی خلاق خود وفادار ماند. آفرینش ( هنری ) وعنای عصیان به خود گرفت. و هرچه هستی انسان بی‌ارزش‌تر شود و غنای حقیقیش را از او بدزدند، هنرمند همن نیاز به‌بیان غنای انسانی او را در یک موضوع واقعی – حسی، و بیرون از نهادهای اجتماعی و هنریِ غالب، حس می‌کند.&lt;br /&gt;
هنر جدید، در قهرمانی‌ترین لحظاتش، کوششی است به‌گریز از ((کالاشدنِ)) هستی.&lt;br /&gt;
همان کوششی که پرولتاریا با وسائل دیگری می‌کند تا در مبارزه‌اش از((بیگانگی)) خلاص شود. [ نک کتب جمعه، 1و2، مقاله‌ی بیگانگی] هنرمندِ ((ملعون)) اواخر قرن نوزدهم و اوایل قرن بیستم، از آن‌رو ملعون است که با بیان فعالیت خلاقش در برابر جهان بی‌تحرک و مجرد بورژوازی ایستادگی و مداومت کرده ‌است. هنرمند با عینیت دادن خود، با خلق چیزهای انسانی و انسانیت یافته، یعنی آثار هنری، حضور انسانی را در چیزها تضمین می‌کند و بدین‌سان در ممانعت از ((کالا شدنِ)) انسانیت یاری می‌کند. بدین گونه هدف والای هنر، نیاز به‌آن و دلیل وجودی آن، قاطع‌تر ازپیش می‌شود، چون در جهانی که معیارهای کمی (ارزش مبادله‌ای) و بیگتنگیانسان برآن حکومت می‌کند، [در چنین جهانی] هنر، که آفرینش، بیان، و عینیت انسان است، یکی از با ارزش‌ترین وسائلی می‌سود که[هنرمند] با آن غنای واقعی انسان را احیا می‌کند، باز می‌گوید، و گسترش می‌دهد. هنر هرگز ضروری‌تر از این نبوده، چون هرگز انسان را ناانسانی شدن تهدید نمی‌کرده است. &lt;br /&gt;
در چند دهه‌ی اخیر پیرامون مفهوم (( از انسانیت تهی شدن هنر)) بحث‌ها درگرفته است، و این بحث را خوزه اُرتگای گاست (Jose Ortegay Gasset) پیش کشیده است. اما این بحث به (( از انسانیت تهی شدن انسان)) توجه نکرده است. یعنی چون یک فرآیند خاص جامعه‌ی بورژوا که به‌وسیله‌ی آن انسان، تحت حکوکتِ تولید اضافی، به مقام یک وسیله، شیء، یا یک کالا کشانده شده، توجه نکرده است. و این را هم باز نشناخته‌اندکه این ((از انسانیت تهی شدنِ)) فرضی هنرپاسخی بود( که برای خود هنر خالی از خطر نبود) به ((از انسانیت تهی شدن)) خودِ انسان. اگرچه این خطرات آشکار بود. هنرمند مجبور بود آن‌ها را با آن شرایط جزئی بپذیرد، یعنی شرایطی که وظیفه‌ی حفظ و حراست آن‌چه را انسانی و ملموس[مقابل مجرد] است احاطه کرده‌اند. بدین سان هنرمند جدید وظیفه‌ای را به‌عهده می‌گرفت که نیروهایش برای آن کافی نبود، زیرا فتح مجدد انسان ملموس، تایید انسان در یک جهانِ بیگانه شده، کاری نبود که با هنرِ تنها انجام بگیرد.&lt;br /&gt;
هنرمند علیه جامعه‌ای که قانون تولید مادی برآن حکم می‌رند واکنش نشان داده است؛ او آن‌قانون را شکسته و از کار خلاقش گِرد خود باروئی بر‌آورده است. او آزادیش را این چنین بیان می‌کرد، اما همچون ثمره‌ی ضرورت. هنرمند راه دیگری جز شکستن قوانین نداشت؛ این تنها راهی بود که او می‌توانست هنرمند باقی بماند. خصومت جامعه او را به‌طغیان واداشت: پس اگرچه او به‌منظور حفظ آزادی خلاقش علم طغیان برافراشته، اما سرچشمه‌های این روحیه‌ی او اساسا اجتماعی است. جامعه‌ی جدید تنها جامعه‌ای بوده است که آفرینش هنری را به‌چنان جلوه‎ی قهرمانانه‌ای می‌آراید که ما در حیات خلاق وان گوگ آدمی با یک مودیلیائی می‌یابیم، چرا که فقط در جامعه‌ی جدید است که هنرمند پی‌می‌برد که در نتیجه‌ی استحاله‌ی اثرهنری به یک شیء ؛ مغاک هولناکی زیر پایش دهان بازکرده است. او با این ادراک توانسته است خود را، چون یمک هنرمند و چون یک انسان، تایید و اثبات کند.&lt;br /&gt;
اما در حالی که خود را اثبات کرده جنبه‌های حیاتی معینی از خود هنر را نیز به‌خطر انداخته است: فواصل را طولانی کرده، بند‌ها را گسسته، و پل‌ها را درهم کوفته است. او کار را تقریبا تا به‌آن‌جا رسانده که آن‌چه را در ذات او به او تعلق دارد، یعنی قابلیت ارتباطش را ، درهم شکسته است. هنر توانسته است با خلاص شدن از یک جامعه‌ی پیش پا افتاده، یعنی از یک جهان تهی شده از انسانیت و مجرد از آن رو بگرداند، و (بدین‌گونه) در محاصره افتاده است. هنر برای حفظ ذات خلاقش چنین بهای وحشتناکی به جامعه بورژوا پرداخته است. و اکنون باید در این یاری جانِ دوباره بدمد، بدین گونه که آن ارتباط رها شده را از نو برقرا ر کند، و پل‌های فروریخته‌ی میان هنرمند و مردم را از ن بسازد. این کار را نمی‌توان با خرید یک فهم آسان‌گیر به قیمت بی‌بها کردن مضاعف انجام داد: یعنی، با بی بها کردن اثر هنری و بیننده‌ی اثر هردو. این ارتباط را فقط می‌توان هم با بالا بردن کیفیت اثر هنری و هم حساسیت نهری مردم( هنر پسندان) حفظ کرد. برا یاین منظور باید پل‌های نوی ساخت، زیرا اگر بنا باشد که آفرینش هنری خود را از این (( من گرائی)) نجات دهد ( که بخش بزرگی از آفرینش هنری بدان درافتاده) وجود این پل‌ها لازم است.&lt;br /&gt;
هنرمند حقیقی توانائی آن‌را دارد که زبان نوی خلق کند که زبان معمولی در ا« مقام ناکام بماند. چیزی که او می‌آفریند به‌خودی خود، هدف نیست، به عکس، وسیله‌ی رسیدن به‌مردم است. هنر حقیق جنبه‌های ذاتی هستی انسان را به طریقی آشکار می‌کند که شاید میان همه مشترک باشد. پس، هنری که به‌کار ارتباط یافتن نمی‌آید نفی جنبه‌ی ذاتی هنر است.&lt;br /&gt;
هنر جدید که بند‌هایش را از یک جهان مجرد بورژوا ( که این ذات خلاق هنر را می‌آزارد) بریده باید پیوندهای نوی با مردم ببندد. این جست‌و‌جو باید از هردو جانب باشد. زیرا مردم هم باید جویای هنر باشند، و بدین‌گونه باید هنر را در نیمه راه این جستجو ببینند. بدین‌سان ، در حالی که هنرمند به‌دنبال وسیله‌ی بیان می‌گردد که این ارتباط را ممکن کند، مردم هم باید به‌دنبال هنر بگردند و از شبه هنرِ یک جهان بازاری شده (reified)   و بی ارزش دست بکشند.&lt;br /&gt;
در هر دو مورد این این مشکل را نمی‌توان در یک سطح صرفا زیبائی شناختی حل کرد. آن ارتباطی که هنرمند در پی آن است فقط وقتی می‌تواند حاصل شود که دیگر محیط، در نظراو، یکسره خصمانه نباشد، جهان مجردی نباشد که فقط می‌تواند آفرینش هنری را بخشکاند. در آن معنا، مشکل ارتباط هنری از مشکلِ دیگر، یعنی یافتنِ ارتباط واقعی در میان انسان‌ها، جدائی ناپذیر است. هنر سرنوشتش را با آن نیروی اجتماعی قسمت می‌کند که در راه‌حل تناقضات میان اجتماع حقیقی و فردیت مبارزه می‌کنند( یعنی، تناقضاتی که هم جامعه را از هم می‌دَرَد و هم فرد را). پس، طغیان قهرمانانه‌ی هنرمند جدید دیگر نباید دارای همان خصلت مخالف خوان و گستاخی باشد که در آغاز داشت، یعنی خصلت زمانی را که در او به‌چشم یک مطرود [جامعه‌ی بورژوا] می‌نگریستند.&lt;br /&gt;
از سوی دیگر، مردم نمی‌توانند فعالانه جویای هنر حقیقی باشند مگر آن‌که خود را از چنگ شبه‌ی هنر جهان انسانیِ بیگانه شده خلاص کنند. زیرا که وجود این هنر ارزان و دروغین در درجه‌ی اول طفیلی نیروهای اقتصادی و صنعتی نیرومند‌ی است رواج آن‌را تضمین می‌کنند. وچون این نیروها در دست آن عناصر اجتماعی است که نفعشان صددرصد در حفظ آن جهان مجرد و بازاری شده است، بنابراین رهائی مردم، قلمرو اختصاصی هنرمندان و استادان زیبائی شناسی نیست. چه این رهائی از آزادی اجتماعی جامعه، چون یک کل تفکیک ناپذیر است.&lt;br /&gt;
و بدین گونه سرنوشت ‌های هنر و جامعه یک‌بار دیگر به گونه‌ای باهم یگانه می‌شوند که برای هردو نقش تعیین کننده خواهد داشت.&lt;br /&gt;
پایان&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-17T08:39:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-096.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-097.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-098.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-099.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-100.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-101.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-103.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{درحال تایپ}}&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از طریق ارزش‌های سیاسی، اخلاقی، دینی و مانند این‌ها. این ارزش‌ها{ که روبنای جامعه را می‌سازند} همیشه در روبنای ایدئو لوژیکی جامعه همپایه  به‌شمار نمی‌آیند. هرگاه که(در یک اثرهنری) ارزشی از پیش به‌ارزش دیگری غلبه یابد، در این حال تعیین کننده‌ی این غلبه همانا موقعیت‌های ملموس اجتماعی- تاریخی است؛ به‌این معنا که برخی از موقعیت‌ها بهتراز موقعیت‌های دیگر آمال و علائق  طبقه‌ی اجتماعی غالب را بیان می‌کنند. تازمانی که در یک جامعه‌ی معین،((جزئی)) به ((کلی)) غالب است، { به‌عبارت دیگر} تازمانی که یک طبقه‌ی اجتماعی علاقه‌ی خاص یا جزئی خود را به قیمت از میان بردن علاقه‌ی عمومی یا کلیِ تمام آن اجتماع تحمیل می‌کند، چنین جامعه‌ای خواهد کوشید تا این غلبه جزئی به کلی را به‌خودِ هنر هم بکشاند: به‌این صورت که اول وحدت دیالکتیکی جزئی و کلی را درهم می‌شکند؛ بعد سعی می‌کند که غلبه‌ی یک ارزش سیاسی، دینی، یا اقتصادیِ جزئی را به‌آن ارزش والای اثر هنری، (یعنی، به‌ارزش زیبائی شناختی آن) تحمیل کند یا از آن ببُرد.&lt;br /&gt;
این غلبه در جامعه‌ی یونان باستان اتفاق افتاده است. در آن جامعه هنر، علی‌الخصوص تراژدی، به خدمت پولیس(Poisدولت-شهر) کشانده شد؛ و یک هنر سیاسیِ سطح عالی شد. ( افلاطون آن‌گاه که به‌طور کلی شاعران و هنرمندان مقلدی را که دستی زیر بال تربیت سیاسی و مدنی نمی‌کردند از حکومت آرمانی خود کنار می‌گذاشت به‌روشنی بیانگر توقعات جامعه از هنر بود.) جامعه‌ی قرون وسطائی ( اروپا ) هنر را به خدمت دین گرفت، و هنرمند، موافق با ایدئولوژی غالب، مردم و اشیاء را پرتوی از یک واقعیت فراتر از حس، فراتر از جهان دانست. اما در این جوامع، این‌طور بگوئیم که مناسبات میان هنرمند و جامعه شفاف بود. هنرمند که ارزش‌های غالب جامعه‌اش را تعالی می‌بخشید، خود را چون عضوی از اجتماعش بازشناخت. و جامعه نیز خود را درهنری که ارزش‌های خاص او را بیان می‌کرد، بازشناخت.&lt;br /&gt;
بعد از رنسانس، مناسبات نو قدرت مناسبات کهنه‌ی فئودالی را به زوال کشاند. طبقه‌ی اجتماعی نویی، یعنی بورژوازی، پیدا شد که قدرتش در درجه‌ی اول به قدرت بالنده‌ی تولید مادی ، به مثابه بیان غلبه‌ی انسان به طبیعت، بسته بود. &lt;br /&gt;
تولید نه فقط قدرت بورژوازی را به‌طبیعت بلکه بر انسان‌ها هم گسترش داد. تولید از خدمت به‌انسان سرپیچید ( به‌خلاف آن‌چه در یونان باستان بود) و در عوض شروع کرد به‌آن که درخدمت تولید باشد. همین که‌انسان از ((هدف)) بودن افتاد و وسیله شد (استحاله‌ی نیروی کار به‌کالا)، تولید علیه انسان شد. همان‌طور که قلمرو تولید مادی بزرگ‌تر می‌شد، همه چیز، همین‌طورهم هنر، تابع قوانین خشک آن می‌شد ( استحاله‌ی اثر هنری به‌کالا ). تا همان حد که قانون تولید مادی دامنه‌اش دراز می‌شد، (( کالاشدن)) ( reification) هستی انسانی هم شدت می‌یافت. حیات، خصلت ملموس و واقعی و خلاقش را ازدست داد و خصلت مجرد به‌خود گرفت.&lt;br /&gt;
در جهانی که همه چیز رنگ کمیت به‌خود می‌گیرد و کجرد می‌شود، هنر که عالی‌ترین صورت بیان هرچیز ملموس و کیفی زندگانی انسان است، با آن جهانِ بیگانه شده را تناقض در پیش می‌گیرد و مامن تباهی‌ناپذیر انسانیت می‌شود. بدین ‌گونه؛، هنر و جامعه به‌طور بنیادی ضد‌هم می‌شوند. هنر، که نماینده‌ی انسانیتِ انکار شده است، با جامهاه‌ای که انسانی نیست به ضدیت برمی‌خیزد؛ و جامعه نیز با هنرمندی که از ((کالا شدن)) تن می‌زند و مادام که سعی می‌کند انسانیتش را آشکار کند ضدیت می‌ورزد.&lt;br /&gt;
این موقعیت، از نظر تاریخی، با سبک رمانتیسم پیدا شده است. و از آن زمان به بعد تناقض میان هنر و جامعه حادتر شده است. هنرمندان بزرگ از جامعه بریده‌اند. چنان که از مردم گریزی‌شان پیداست. جامعه‌ی بورژوا از این که هنرمند دست رد به‌سینه‌اش زده جوابش را بافقر، و دیوانگی یا مرگ می‌دهد. پیش از‌که بورژوازی پایه‌های حکومتش را محکم مستقر کند- یعنی، در جامعه‌ی یونان، در قرون وسطی، در دوره‌های[سبک] باروک [Baroque]  در قرن هفدهم با [ سبک ] نئو کلاسیک [ اواسط قرن هجدهم] – هنرمند  آثارش را هماهنگ با جامعه خلق می‌کرد. آنان با رمانتیسم آغاز کردند و بتدریج منزوی و گوشه گیر شدند. خصوصا از نیمه‌ی دوم قرن نوزدهم به‌این طرف.&lt;br /&gt;
هنرمند تن به‌این نداد که کارش را باجهانِ مجرد و کمیت شده و پیش پا افتاده‌ی جامعه‌ی بورژوا بیامیزد. هنرمند بی‌آن‌که کاملا به جدایی مغاک‌گونه‌اش از جامعه‌ی بورژوا آگاه باشد از بنیاد با آن جامعه از درِ مخالفت درآمد و تنها از این راه به اراده‌ی خلاق خود وفادار ماند. آفرینش ( هنری ) وعنای عصیان به خود گرفت. و هرچه هستی انسان بی‌ارزش‌تر شود و غنای حقیقیش را از او بدزدند، هنرمند همن نیاز به‌بیان غنای انسانی او را در یک موضوع واقعی – حسی، و بیرون از نهادهای اجتماعی و هنریِ غالب، حس می‌کند.&lt;br /&gt;
هنر جدید، در قهرمانی‌ترین لحظاتش، کوششی است به‌گریز از ((کالاشدنِ)) هستی.&lt;br /&gt;
همان کوششی که پرولتاریا با وسائل دیگری می‌کند تا در مبارزه‌اش از((بیگانگی)) خلاص شود. [ نک کتب جمعه، 1و2، مقاله‌ی بیگانگی] هنرمندِ ((ملعون)) اواخر قرن نوزدهم و اوایل قرن بیستم، از آن‌رو ملعون است که با بیان فعالیت خلاقش در برابر جهان بی‌تحرک و مجرد بورژوازی ایستادگی و مداومت کرده ‌است. هنرمند با عینیت دادن خود، با خلق چیزهای انسانی و انسانیت یافته، یعنی آثار هنری، حضور انسانی را در چیزها تضمین می‌کند و بدین‌سان در ممانعت از ((کالا شدنِ)) انسانیت یاری می‌کند. بدین گونه هدف والای هنر، نیاز به‌آن و دلیل وجودی آن، قاطع‌تر ازپیش می‌شود، چون در جهانی که معیارهای کمی (ارزش مبادله‌ای) و بیگتنگیانسان برآن حکومت می‌کند، [در چنین جهانی] هنر، که آفرینش، بیان، و عینیت انسان است، یکی از با ارزش‌ترین وسائلی می‌سود که[هنرمند] با آن غنای واقعی انسان را احیا می‌کند، باز می‌گوید، و گسترش می‌دهد. هنر هرگز ضروری‌تر از این نبوده، چون هرگز انسان را ناانسانی شدن تهدید نمی‌کرده است. &lt;br /&gt;
در چند دهه‌ی اخیر پیرامون مفهوم (( از انسانیت تهی شدن هنر)) بحث‌ها درگرفته است، و این بحث را خوزه اُرتگای گاست (Jose Ortegay Gasset) پیش کشیده است. اما این بحث به (( از انسانیت تهی شدن انسان)) توجه نکرده است. یعنی چون یک فرآیند خاص جامعه‌ی بورژوا که به‌وسیله‌ی آن انسان، تحت حکوکتِ تولید اضافی، به مقام یک وسیله، شیء، یا یک کالا کشانده شده، توجه نکرده است. و این را هم باز نشناخته‌اندکه این ((از انسانیت تهی شدنِ)) فرضی هنرپاسخی بود( که برای خود هنر خالی از خطر نبود) به ((از انسانیت تهی شدن)) خودِ انسان. اگرچه این خطرات آشکار بود. هنرمند مجبور بود آن‌ها را با آن شرایط جزئی بپذیرد، یعنی شرایطی که وظیفه‌ی حفظ و حراست آن‌چه را انسانی و ملموس[مقابل مجرد] است احاطه کرده‌اند. بدین سان هنرمند جدید وظیفه‌ای را به‌عهده می‌گرفت که نیروهایش برای آن کافی نبود، زیرا فتح مجدد انسان ملموس، تایید انسان در یک جهانِ بیگانه شده، کاری نبود که با هنرِ تنها انجام بگیرد.&lt;br /&gt;
هنرمند علیه جامعه‌ای که قانون تولید مادی برآن حکم می‌رند واکنش نشان داده است؛ او آن‌قانون را شکسته و از کار خلاقش گِرد خود باروئی بر‌آورده است. او آزادیش را این چنین بیان می‌کرد، اما همچون ثمره‌ی ضرورت. هنرمند راه دیگری جز شکستن قوانین نداشت؛ این تنها راهی بود که او می‌توانست هنرمند باقی بماند. خصومت جامعه او را به‌طغیان واداشت: پس اگرچه او به‌منظور حفظ آزادی خلاقش علم طغیان برافراشته، اما سرچشمه‌های این روحیه‌ی او اساسا اجتماعی است. جامعه‌ی جدید تنها جامعه‌ای بوده است که آفرینش هنری را به‌چنان جلوه‎ی قهرمانانه‌ای می‌آراید که ما در حیات خلاق وان گوگ آدمی با یک مودیلیائی می‌یابیم، چرا که فقط در جامعه‌ی جدید است که هنرمند پی‌می‌برد که در نتیجه‌ی استحاله‌ی اثرهنری به یک شیء ؛ مغاک هولناکی زیر پایش دهان بازکرده است. او با این ادراک توانسته است خود را، چون یمک هنرمند و چون یک انسان، تایید و اثبات کند.&lt;br /&gt;
اما در حالی که خود را اثبات کرده جنبه‌های حیاتی معینی از خود هنر را نیز به‌خطر انداخته است: فواصل را طولانی کرده، بند‌ها را گسسته، و پل‌ها را درهم کوفته است. او کار را تقریبا تا به‌آن‌جا رسانده که آن‌چه را در ذات او به او تعلق دارد، یعنی قابلیت ارتباطش را ، درهم شکسته است. هنر توانسته است با خلاص شدن از یک جامعه‌ی پیش پا افتاده، یعنی از یک جهان تهی شده از انسانیت و مجرد از آن رو بگرداند، و (بدین‌گونه) در محاصره افتاده است. هنر برای حفظ ذات خلاقش چنین بهای وحشتناکی به جامعه بورژوا پرداخته است. و اکنون باید در این یاری جانِ دوباره بدمد، بدین گونه که آن ارتباط رها شده را از نو برقرا ر کند، و پل‌های فروریخته‌ی میان هنرمند و مردم را از ن بسازد. این کار را نمی‌توان با خرید یک فهم آسان‌گیر به قیمت بی‌بها کردن مضاعف انجام داد: یعنی، با بی بها کردن اثر هنری و بیننده‌ی اثر هردو. این ارتباط را فقط می‌توان هم با بالا بردن کیفیت اثر هنری و هم حساسیت نهری مردم( هنر پسندان) حفظ کرد. برا یاین منظور باید پل‌های نوی ساخت، زیرا اگر بنا باشد که آفرینش هنری خود را از این (( من گرائی)) نجات دهد ( که بخش بزرگی از آفرینش هنری بدان درافتاده) وجود این پل‌ها لازم است.&lt;br /&gt;
هنرمند حقیقی توانائی آن‌را دارد که زبان نوی خلق کند که زبان معمولی در ا« مقام ناکام بماند. چیزی که او می‌آفریند به‌خودی خود، هدف نیست، به عکس، وسیله‌ی رسیدن به‌مردم است. هنر حقیق جنبه‌های ذاتی هستی انسان را به طریقی آشکار می‌کند که شاید میان همه مشترک باشد. پس، هنری که به‌کار ارتباط یافتن نمی‌آید نفی جنبه‌ی ذاتی هنر است.&lt;br /&gt;
هنر جدید که بند‌هایش را از یک جهان مجرد بورژوا ( که این ذات خلاق هنر را می‌آزارد) بریده باید پیوندهای نوی با مردم ببندد. این جست‌و‌جو باید از هردو جانب باشد. زیرا مردم هم باید جویای هنر باشند، و بدین‌گونه باید هنر را در نیمه راه این جستجو ببینند. بدین‌سان ، در حالی که هنرمند به‌دنبال وسیله‌ی بیان می‌گردد که این ارتباط را ممکن کند، مردم هم باید به‌دنبال هنر بگردند و از شبه هنرِ یک جهان بازاری شده (reified)   و بی ارزش دست بکشند.&lt;br /&gt;
در هر دو مورد این&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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تایپ ادامه دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-17T07:29:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-100.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-103.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از طریق ارزش‌های سیاسی، اخلاقی، دینی و مانند این‌ها. این ارزش‌ها{ که روبنای جامعه را می‌سازند} همیشه در روبنای ایدئو لوژیکی جامعه همپایه  به‌شمار نمی‌آیند. هرگاه که(در یک اثرهنری) ارزشی از پیش به‌ارزش دیگری غلبه یابد، در این حال تعیین کننده‌ی این غلبه همانا موقعیت‌های ملموس اجتماعی- تاریخی است؛ به‌این معنا که برخی از موقعیت‌ها بهتراز موقعیت‌های دیگر آمال و علائق  طبقه‌ی اجتماعی غالب را بیان می‌کنند. تازمانی که در یک جامعه‌ی معین،((جزئی)) به ((کلی)) غالب است، { به‌عبارت دیگر} تازمانی که یک طبقه‌ی اجتماعی علاقه‌ی خاص یا جزئی خود را به قیمت از میان بردن علاقه‌ی عمومی یا کلیِ تمام آن اجتماع تحمیل می‌کند، چنین جامعه‌ای خواهد کوشید تا این غلبه جزئی به کلی را به‌خودِ هنر هم بکشاند: به‌این صورت که اول وحدت دیالکتیکی جزئی و کلی را درهم می‌شکند؛ بعد سعی می‌کند که غلبه‌ی یک ارزش سیاسی، دینی، یا اقتصادیِ جزئی را به‌آن ارزش والای اثر هنری، (یعنی، به‌ارزش زیبائی شناختی آن) تحمیل کند یا از آن ببُرد.&lt;br /&gt;
این غلبه در جامعه‌ی یونان باستان اتفاق افتاده است. در آن جامعه هنر، علی‌الخصوص تراژدی، به خدمت پولیس(Poisدولت-شهر) کشانده شد؛ و یک هنر سیاسیِ سطح عالی شد. ( افلاطون آن‌گاه که به‌طور کلی شاعران و هنرمندان مقلدی را که دستی زیر بال تربیت سیاسی و مدنی نمی‌کردند از حکومت آرمانی خود کنار می‌گذاشت به‌روشنی بیانگر توقعات جامعه از هنر بود.) جامعه‌ی قرون وسطائی ( اروپا ) هنر را به خدمت دین گرفت، و هنرمند، موافق با ایدئولوژی غالب، مردم و اشیاء را پرتوی از یک واقعیت فراتر از حس، فراتر از جهان دانست. اما در این جوامع، این‌طور بگوئیم که مناسبات میان هنرمند و جامعه شفاف بود. هنرمند که ارزش‌های غالب جامعه‌اش را تعالی می‌بخشید، خود را چون عضوی از اجتماعش بازشناخت. و جامعه نیز خود را درهنری که ارزش‌های خاص او را بیان می‌کرد، بازشناخت.&lt;br /&gt;
بعد از رنسانس، مناسبات نو قدرت مناسبات کهنه‌ی فئودالی را به زوال کشاند. طبقه‌ی اجتماعی نویی، یعنی بورژوازی، پیدا شد که قدرتش در درجه‌ی اول به قدرت بالنده‌ی تولید مادی ، به مثابه بیان غلبه‌ی انسان به طبیعت، بسته بود. &lt;br /&gt;
تولید نه فقط قدرت بورژوازی را به‌طبیعت بلکه بر انسان‌ها هم گسترش داد. تولید از خدمت به‌انسان سرپیچید ( به‌خلاف آن‌چه در یونان باستان بود) و در عوض شروع کرد به‌آن که درخدمت تولید باشد. همین که‌انسان از ((هدف)) بودن افتاد و وسیله شد (استحاله‌ی نیروی کار به‌کالا)، تولید علیه انسان شد. همان‌طور که قلمرو تولید مادی بزرگ‌تر می‌شد، همه چیز، همین‌طورهم هنر، تابع قوانین خشک آن می‌شد ( استحاله‌ی اثر هنری به‌کالا ). تا همان حد که قانون تولید مادی دامنه‌اش دراز می‌شد، (( کالاشدن)) ( reification) هستی انسانی هم شدت می‌یافت. حیات، خصلت ملموس و واقعی و خلاقش را ازدست داد و خصلت مجرد به‌خود گرفت.&lt;br /&gt;
در جهانی که همه چیز رنگ کمیت به‌خود می‌گیرد و کجرد می‌شود، هنر که عالی‌ترین صورت بیان هرچیز ملموس و کیفی زندگانی انسان است، با آن جهانِ بیگانه شده را تناقض در پیش می‌گیرد و مامن تباهی‌ناپذیر انسانیت می‌شود. بدین ‌گونه؛، هنر و جامعه به‌طور بنیادی ضد‌هم می‌شوند. هنر، که نماینده‌ی انسانیتِ انکار شده است، با جامهاه‌ای که انسانی نیست به ضدیت برمی‌خیزد؛ و جامعه نیز با هنرمندی که از ((کالا شدن)) تن می‌زند و مادام که سعی می‌کند انسانیتش را آشکار کند ضدیت می‌ورزد.&lt;br /&gt;
این موقعیت، از نظر تاریخی، با سبک رمانتیسم پیدا شده است. و از آن زمان به بعد تناقض میان هنر و جامعه حادتر شده است. هنرمندان بزرگ از جامعه بریده‌اند. چنان که از مردم گریزی‌شان پیداست. جامعه‌ی بورژوا از این که هنرمند دست رد به‌سینه‌اش زده جوابش را بافقر، و دیوانگی یا مرگ می‌دهد. پیش از‌که بورژوازی پایه‌های حکومتش را محکم مستقر کند- یعنی، در جامعه‌ی یونان، در قرون وسطی، در دوره‌های[سبک] باروک [Baroque]  در قرن هفدهم با [ سبک ] نئو کلاسیک [ اواسط قرن هجدهم] – هنرمند  آثارش را هماهنگ با جامعه خلق می‌کرد. آنان با رمانتیسم آغاز کردند و بتدریج منزوی و گوشه گیر شدند. خصوصا از نیمه‌ی دوم قرن نوزدهم به‌این طرف.&lt;br /&gt;
هنرمند تن به‌این نداد که کارش را باجهانِ مجرد و کمیت شده و پیش پا افتاده‌ی جامعه‌ی بورژوا بیامیزد. هنرمند بی‌آن‌که کاملا به جدایی مغاک‌گونه‌اش از جامعه‌ی بورژوا آگاه باشد از بنیاد با آن جامعه از درِ مخالفت درآمد و تنها از این راه به اراده‌ی خلاق خود وفادار ماند. آفرینش ( هنری ) وعنای عصیان به خود گرفت. و هرچه هستی انسان بی‌ارزش‌تر شود و غنای حقیقیش را از او بدزدند، هنرمند همن نیاز به‌بیان غنای انسانی او را در یک موضوع واقعی – حسی، و بیرون از نهادهای اجتماعی و هنریِ غالب، حس می‌کند.&lt;br /&gt;
هنر جدید، در قهرمانی‌ترین لحظاتش، کوششی است به‌گریز از ((کالاشدنِ)) هستی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-14T09:35:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
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Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
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ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از طریق ارزش‌های سیاسی، اخلاقی، دینی و مانند این‌ها. این ارزش‌ها{ که روبنای جامعه را می‌سازند} همیشه در روبنای ایدئو لوژیکی جامعه همپایه  به‌شمار نمی‌آیند. هرگاه که(در یک اثرهنری) ارزشی از پیش به‌ارزش دیگری غلبه یابد، در این حال تعیین کننده‌ی این غلبه همانا موقعیت‌های ملموس اجتماعی- تاریخی است؛ به‌این معنا که برخی از موقعیت‌ها بهتراز موقعیت‌های دیگر آمال و علائق  طبقه‌ی اجتماعی غالب را بیان می‌کنند. تازمانی که در یک جامعه‌ی معین،((جزئی)) به ((کلی)) غالب است، { به‌عبارت دیگر} تازمانی که یک طبقه‌ی اجتماعی علاقه‌ی خاص یا جزئی خود را به قیمت از میان بردن علاقه‌ی عمومی یا کلیِ تمام آن اجتماع تحمیل می‌کند، چنین جامعه‌ای خواهد کوشید تا این غلبه جزئی به کلی را به‌خودِ هنر هم بکشاند: به‌این صورت که اول وحدت دیالکتیکی جزئی و کلی را درهم می‌شکند؛ بعد سعی می‌کند که غلبه‌ی یک ارزش سیاسی، دینی، یا اقتصادیِ جزئی را به‌آن ارزش والای اثر هنری، (یعنی، به‌ارزش زیبائی شناختی آن) تحمیل کند یا از آن ببُرد.&lt;br /&gt;
این غلبه در جامعه‌ی یونان باستان اتفاق افتاده است. در آن جامعه هنر، علی‌الخصوص تراژدی، به خدمت پولیس(Poisدولت-شهر) کشانده شد؛ و یک هنر سیاسیِ سطح عالی شد. ( افلاطون آن‌گاه که به‌طور کلی شاعران و هنرمندان مقلدی را که دستی زیر بال تربیت سیاسی و مدنی نمی‌کردند از حکومت آرمانی خود کنار می‌گذاشت به‌روشنی بیانگر توقعات جامعه از هنر بود.) جامعه‌ی قرون وسطائی ( اروپا ) هنر را به خدمت دین گرفت، و هنرمند، موافق با ایدئولوژی غالب، مردم و اشیاء را پرتوی از یک واقعیت فراتر از حس، فراتر از جهان دانست. اما در این جوامع، این‌طور بگوئیم که مناسبات میان هنرمند و جامعه شفاف بود. هنرمند که ارزش‌های غالب جامعه‌اش را تعالی می‌بخشید، خود را چون عضوی از اجتماعش بازشناخت. و جامعه نیز خود را درهنری که ارزش‌های خاص او را بیان می‌کرد، بازشناخت.&lt;br /&gt;
بعد از رنسانس، مناسبات نو قدرت مناسبات کهنه‌ی فئودالی را به زوال کشاند. طبقه‌ی اجتماعی نویی، یعنی بورژوازی، پیدا شد که قدرتش در درجه‌ی اول به قدرت بالنده‌ی تولید مادی ، به مثابه بیان غلبه‌ی انسان به طبیعت، بسته بود. &lt;br /&gt;
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تایپ ادامه دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-14T08:29:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{درحال تایپ}}&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین کشورها، ناهمانندترین فرهنگ‌ها، و متضادترین جوامع در آن ساکنند. بدین گونه،هنر بزرگ اثبات کلیت انسانی است، اما این کلیت از طریق یک {موجود} جزئی{ یعنی هنرمند}  حاصل می‌شود: به این معنا که هنرمند، انسانِ زمان خویش، جامعه‌ی خویش، و فرهنگ جزئی و طبقه‌ی اجتماعی خویش است. هر هنربزرگ در خاستگاه‌هایش جزئی است، اما از نظر نتایجش، کلی است. انسان، چون یک موجود جزئی و تاریخی خود را کلیت می‌بخشد؛ اما نه در سطح کلیتی که مجرد و غیر شخصی، یا ناانسانی باشد. در عوض، او جهان انسانیش را غنی می‌کند. و در برابر هرگونه تهی شدن از انسانیت (dehumanization) می‌ایستد.&lt;br /&gt;
هنر تا به‌میزانی که خاستگاه‌هایش در اینجا و اکنونِ واقعی بودئ توانسته به زندگی ادامه دهد و دوام بیاورد: فقط به‌این طریق هنر به‌کلیت راستین خود رسیده است. جزئی و کلی چنان به هماهنگی در یک آفرینش هنری یگانه شده‌اند که هرگونه تاکید زیاده از حد بریکی از این دو کافی است این هماهنگی دیالکتیکی را به‌هم بریزد، یا آن نتایج وحشتناکی که برای خود اثر هنری به‌بار می‌آورد. گاهی هنرمند این وحدت را به‌هم می‌ریزد. از ترس آن{ مسائل} جزئی( { یعنی از ترس} زمان و طبقه و جامعه‌اش): گاهی هم جامعه است که هنر را به راه‌های کج می‌کشاند. یعنی با آن کوشش‌های نگرانش که می‌خواهد جزئیت خاص خود را ( یعنی، ارزش‌ها و علائق و اندیشه‌هایش را) تحمیل کند.&lt;br /&gt;
سرشت احتمالی مناسبات هنر و جامعه نه فقط از این دیالکتیکِ کلی و جزئی مشتق می‌شود، بل‌که از خصلت دوگانه‌ی اثر هنری نیز آب می‌خورد. یعنی هم از وسیله و هم هدف آن، هم از وحدت اجتناب‌ناپذیر ارزش‌های ذاتی و عرضی(یا بیرونی) آن. هدف نهائی هر اثر هنری پهناور کردن و غنا بخشیدن به قلمرو انسانی است. هنرمند، ارزش والای یک اثر هنری را، یعنی ارزش زیبائی شناختی آن‌را تحقق می‌بخشد. تا آن‌جا که می‌تواند به ماده صورت معینی بدهد تا محتوای انسانی و عاطفی و ایدئولوژیک معینی را عینیت ببخشد، که در نتیجه‌ی آن واقعیت خود را گسترش می‌دهد.&lt;br /&gt;
اما ارزش والای اثر هنری- که هدف نهائی و دلیل وجودی آن است- همراه با ارزش‌های دیگر و از طریق آن ارزش‌ها حاصل می‌شود. یعنی از&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
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Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند. به‌این ترتیب، هنر و جامعه لزوما به‌هم بسته‌اندو به این معنا که هیچ هنری نیست که از تاثیرات اجتماعی برکنار مانده باشد و در عوض، هیچ هنری هم نیست که در جامعه موثر نبوده باشد. هیچ جامعه‌ای از حقِ تملک هنر خاص خود، و در نتیجه، از حق خود به‌تاثیر نهادنِ در هنر نگذشته است. هنر تقریبا به قدمت خود انسان است، یعنی تقریبا به قدمت جامعه.&lt;br /&gt;
اما مناسبات میان هنر و جامعه مناسبات ثابت و بی‌تغییر نیست؛ این مناسبات تاریخی و احتمالی است. نظر هنرمند وجامعه در باره‌ی یکدیگر عوض می‌شود چون که هنرمند، از آن‌جا که یک موجود انسانی واقعی و مادی است عوض می‌شود، همی‌طور هم ارزش‌ها، آرمان‌ها و سنت‌های جامعه‌ئی که او هنرش را در آن ایجاد می‌کند، عوض می‌شود. آن‌چه بار‌ها در باره‌ی انسان گفته شد می‌تواند با دلیل محکم‌تری در باره‌ی هنر و جامعه هم گفته شود. به‌این معنی که هنر و جامعه ماهیتی ندارند، فقط تاریخ دارند. پس مناسبات‌شان با یکدیگر پا به‌پای تاریخ عوض می‌شود؛ ویژگی‌های این مناسبات، ازنظر هنرمند، گاهی به‌هماهنگی و همداستانی مشخص می‌شود، گاهی به‌طفره و عقب‌نشینی، و گاهی هم به‌اعتراض و عصیان، و نظر جامعه یا حکومت می‌تواند قاتق نان آفرینش هنری باشد و یا بلای جان آن. آزادی اخلاق را، گاهی کم و گاهی زیاد، حفظ می‌کند یا محدود.&lt;br /&gt;
خصلت نامشخص مناسبات میان هنر و جامعه از سرشت نامشخص خودِ هنر آب می‌خورد. هر اثر بزرگ هنری میل به کلیت دارد، میلش به‌آفرینش یک جهان انسانس یا((انسانی شده)) است که از جزئیات تاریخی، اجتماعی یا طبقاتی فراتر می‌رود. به‌این ترتیب آن اثر بزرگ هنری یا آن جهان هنری یگانه می‌شود که آثار هنری دورترین زمان‌ها، گوناگون‌ترین &lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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		<updated>2010-07-13T10:55:05Z</updated>

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&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-097.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۷]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-099.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-100.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-101.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-103.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-104.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;درباب هنر و جامعه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
اگر هنرمند و جامعه هر دو به‌مناسبات اجتماعی هنر و جامعه علاقمندند، برای این است که فعالیت هنری یک فعالیت ذاتی انسان است. یعنی، هم ذاتی هنرمند است و ذاتی هواخواه هنر. ذاتی هنرمند است چون که او در آفرینش خود نیروهای ذاتی وجودش را تحقق می‌بخشد، و این در همان حالی است که او باعینیت دادن غنای انسانیت، وسیله‌ی ارتباط نو و اصیلی میان خود و دیگران ایجاد می‌کند. از سوی دیگر، این فعالیت هنری ذاتی هنر دوستان نیز هست، چون این‌ها حس می‌کنند که نیاز حیاتی انسان جذب آن تجربه‌ی انسانی است که هنرمند تواتنسته آن را عینیت ببخشد. لازم نیست که این‌ها هنرمند باشند. و همین‌طور این کار برای آن نهاد‌های اجتماعی هم که مبین علائق و آمال گروه‌های اجتماعی معینی هستند نیز لازم است، زیرا این نهاد‌ها آشکارا به‌کارکرد اجتماعی هنر، و وزن عاطفی و ایدئولوژیک آن آگاهند.&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<updated>2010-07-13T10:16:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
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ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملموس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-095.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۵]]&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
اما بیایید به رابطه‌ی هنر و جامعه دقیق‌تر توجه کنیم، و از دیدگاه هنرمند به این دو نگاه کنیم. در آن‌صورت خواهیم دید که هنرمند تا زمانی که آ« نیاز انسانیِ به‌آفرینش آزاد را درخود حس می‌کند، به‌طزیقی که دیگران شاید در ثمرات آفرینش او سهیم باشند، نمی‌تواند به ماهیت مناسبات اجتماعی بی‌اعتنا باشد، چه در چارچوب همین مناسبات است که او به‌آفرینش آثار هنری می‌پردازد، خواه این مناسبات مطلوب آفرینش هنری باشد و خواه دشمن آن. همچنین خواهیم دید که چگونه پیوند‌های اجتماعیِ غالب به‌طرز یگانه‌ای از هنرمند سردرمی‌آورد. کارهنرمند، چه بخواهد و چه نخواهد، ناگزیر بازتاب احساسات او در باره‌ی خود اوست، یعنی در باره‌ی یک انسان ملومس که در یک نظام اجتماعی معینی زندگی می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-105.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۵]]&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی راستین هنری کسی را عمیقا به‌حرکت در‌آورد، دیگر این شخص همانی نخواهد بود که پیش از این بوده است.&lt;br /&gt;
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[[Image:4-093.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:4-094.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:4-102.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۱۰۲]]&lt;br /&gt;
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ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
نمی‌توان رابطه‌ی میان هنر و جامعه را نادیده گرفت، زیرا که هنر، خود یک پدیده‌ی اجتماعی است: اول آن‌که هنرمند، هرچند تجربه‌ی اولیه‌اش تجربه‌ئی منحصر به‌خود او بوده باشد، باز موجودی اجتماعی است؛ دوم آن‌که اثرش ، هراندازه هم که عمیقا با تجربه‌ی اولیه‌اش مشخص شود و هر اندازه هم که عینیت دادن این تجربه یا صورت آن یکه و تکرار ناپذیر که باشد، باز آن اثر همیشه پلی و حلقه‌ی اتصالی است میان او و اعضای دیگر آن جامعه؛ سوم آن‌که اثر هنری در دیگران موثر می‌افتد - یعنی در این نکته سهمی دارد که بر اندیشه‌ها، هدف‌ها، یا ارزش‌ها‌ی‌شان مهر تایید می‌زنند یا آن‌ها را بی سکه می‌کند- پس، یک نیروی&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
کسانی که در هنر به‌چشم یک فعالیت کاملا بی‌دلیل یا بازی‌وار نگاه می‌کنند، یاکسانی که هنر را تجلی نهادی ترین فردیت هنرمند می‌دانند، و نیز کسانی که می‌پندارند هنر قلمرویی است مطلقا مستقل که از هرگونه مشروط بودن شانه خالی می‌کند، آنان اهمیت رابطه‌ی میان هنر و جامعه را انکار خواهند کرد، یا دست‌کم آن‌را بسیار ناچیز جلوه خواهند داد. باآن‌که هنر ارزش ذاتی دارد، اما این را نباید به معنای بی‌دلیل بودن آن گرفت؛ درحالی که هنر را می‌توان بیان ژرف‌ترین فردیت هنرمند دانست، اما این فردیت، فردیتی واقعی و ملموس است، نه چیزی مجرد که در حاشیه‌ی اجتماع پنداشته شود؛ و در عین حال که هنر می‌تواند   &lt;br /&gt;
قلمروی مستقل باشد، اما این استقلال مشروط بودنش را نفی نمی‌کند.&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Image:4-092.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۴ صفحه ۹۲]]&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است)،و استتیک و مارکسیسم (1970) . در باب هنر و جامعه فصلی از کتاب هنر و جامعه است. فصول دیگری از این کتاب را در شماره‌های آینده‌ی کتاب جمعه خواهید خواند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به یک معنا، هر جامعه لایق همان هنری است که دارد. یکی به‌این دلیل که آن هنر را دوست می‌دارد یا تحمل می‌کند، و دیگر به‌این دلیل که هنرمندان، که اعضای همان جامعه‌اند، آثارشان را مطابق بانوع خاص مناسباتی که با آن جامعه دارند خلق می‌کنند. معنای این سخن آن است که رابطه‌ی هنر و جامعه نمی‌تواند چنین باشد که آن دو با هم بیگانه باشند یا بی‌اعتنا، و این دو یا یکدیگر را می‌جویند یا از یکدیگر پرهیز می‌کنند، به‌هم می‌رسند یا ازهم جدا می‌شوند، با این همه، هرگز نمی‌توانند یکباره به‌یکدیگر پشت کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>در باب هنر و جامعه</title>
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Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
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ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است).&lt;br /&gt;
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Adolf Sanchez Vazquez&lt;br /&gt;
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ع. پاشایی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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آدولف سانشز واسکز در 1915 در الجزیراس (Algecires ،الجزیره الخضرا). در اسپانیا متولد شد، و در پایان جنگ داخلی اسپانیا به مکزیک پناهنده شد. واسکز اکنون استاد استتیک( زیبایی شناسی) و فلسفه‌ی معاصر است. این فیلسوف در فلسفه، به‌ویژه در زمینه‌ی استتیک مارکسیستی، آثار با ارزشی دارد، چون (( اندیشه‌های استتسکی مارکس؛ گفتارهائی در باره‌ی استتیک مارکسیستی، (1965) ( که در 1973 با نام هنر و جامعه به انگلیسی درآمده است).&lt;br /&gt;
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		<title>شعر من</title>
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کامی مورا هاجیمه  Kamimura Hajime  &lt;br /&gt;
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(متولدسال 1910 در حومه‌ی ناکازاکی)&lt;br /&gt;
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اگر در کنار تپه کسی مسکن گزیند&lt;br /&gt;
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مه به کاشانه‌تان راه می‌یابد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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و زنجره‌ئی برساعت دیواری‌تان می‌خزد و آوا که می‌دهد&lt;br /&gt;
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سنجاقکی هم‌اکنون در کلبه‌ام به ‌پرواز در‌آمد&lt;br /&gt;
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و من نشسته‌ام و شعری می‌سرایم&lt;br /&gt;
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قلم را سخت در دست می‌فشارم&lt;br /&gt;
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و زیرکانه در باره‌ی زندگی خویش&lt;br /&gt;
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خطوطی برکاغذ می‌آورم&lt;br /&gt;
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آنگاه که از دنیا و یا مردم دنیا زبان به شکایت می‌گشایم&lt;br /&gt;
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بدانگاه که بیزاری می‌جویم و از نارضائی‌ها سخن می‌گویم&lt;br /&gt;
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می‌دانم که آن ایمان بایسته را در زندگی نیافته‌ام.&lt;br /&gt;
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غم‌ها و شادمانی‌های آدمی&lt;br /&gt;
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به ماننده‌ی باد است&lt;br /&gt;
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که سنجاقک را با خود می‌برد.&lt;br /&gt;
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پشت میزم نشسته‌ام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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و به مفاهیم عمیق‌تری می‌اندیشم.&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه همایون نوراحمد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شعر من&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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کامی مورا هاجیمه  Kamimura Hajime  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(متولدسال 1910 در حومه‌ی ناکازاکی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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اگر در کنار تپه کسی مسکن گزیند&lt;br /&gt;
مه به کاشانه‌تان راه می‌یابد&lt;br /&gt;
و زنجره‌ئی برساعت دیواری‌تان می‌خزد و آوا که می‌دهد&lt;br /&gt;
سنجاقکی هم‌اکنون در کلبه‌ام به ‌پرواز در‌آمد&lt;br /&gt;
و من نشسته‌ام و شعری می‌سرایم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قلم را سخت در دست می‌فشارم&lt;br /&gt;
و زیرکانه در باره‌ی زندگی خویش&lt;br /&gt;
خطوطی برکاغذ می‌آورم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنگاه که از دنیا و یا مردم دنیا زبان به شکایت می‌گشایم&lt;br /&gt;
بدانگاه که بیزاری می‌جویم و از نارضائی‌ها سخن می‌گویم&lt;br /&gt;
می‌دانم که آن ایمان بایسته را در زندگی نیافته‌ام.&lt;br /&gt;
غم‌ها و شادمانی‌های آدمی&lt;br /&gt;
به ماننده‌ی باد است&lt;br /&gt;
که سنجاقک را با خود می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پشت میزم نشسته‌ام&lt;br /&gt;
و به مفاهیم عمیق‌تری می‌اندیشم.&lt;br /&gt;
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		<title>بحث پرونده:4-086.jpg</title>
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&lt;br /&gt;
کامی مورا هاجیمه  Kamimura Hajime  &lt;br /&gt;
(متولدسال 1910 در حومه‌ی ناکازاکی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اگر در کنار تپه کسی مسکن گزیند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مه به کاشانه‌تان راه می‌یابد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و زنجره‌ئی برساعت دیواری‌تان می‌خزد و آوا که می‌دهد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سنجاقکی هم‌اکنون در کلبه‌ام به ‌پرواز در‌آمد&lt;br /&gt;
و من نشسته‌ام و شعری می‌سرایم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قلم را سخت در دست می‌فشارم&lt;br /&gt;
و زیرکانه در باره‌ی زندگی خویش&lt;br /&gt;
خطوطی برکاغذ می‌آورم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنگاه که از دنیا و یا مردم دنیا زبان به شکایت می‌گشایم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بدانگاه که بیزاری می‌جویم و از نارضائی‌ها سخن می‌گویم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
می‌دانم که آن ایمان بایسته را در زندگی نیافته‌ام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
غم‌ها و شادمانی‌های آدمی&lt;br /&gt;
به ماننده‌ی باد است&lt;br /&gt;
که سنجاقک را با خود می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پشت میزم نشسته‌ام&lt;br /&gt;
و به مفاهیم عمیق‌تری می‌اندیشم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه همایون نوراحمد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
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[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو کاری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما افسانه‌ی فرخی زنده ماند. غزل‌های عاشقانه‌ی او میان مردم زمزمه می‌شد بی‌آنکه اغلب بدانند از کیست. برخی از بیت‌هایش به عنوان شاهدِ مثال بارها به‌کار رفته است که اغلب فکر می‌کنند بیتی است از شاعری کهن.&lt;br /&gt;
باید چهل سال می‌گذشت تا در انقلابی و در نظامی که فرخی اساسا فکرش را نکرده بود و شاید با برخی مظاهرش مخالف بود نامش زنده شود، و نه‌تنها نامش که نخستین بار ادبیات سیاسیش در مقیاس‌های وسیع در جامعه‌ی انقلابی به‌کار رود و آن آوای فرو خورده و منکوب شده به گوش سه نسل بعد برسد که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
توده را با جنگ صنفی آشنا باید نمود...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن زمان که بنهادم سر به‌پای آزادی...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اگر خدای به من فرصتی دهد یکروز&lt;br /&gt;
کشم ز مرتجعین انتقام آزادی...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رساتر چون شود این ناله‌ها فریاد می‌گردد...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او مغرور به آینده‌ئی که خواهد آمد و انقلابی که درخواهد گرفت، زندگی خود را فدای فردا می‌خواست و علیرغم همه‌ی ضعف‌های انسانیش این نقش را تا به‌آخر ادامه داد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;محمد علی سپانلو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T17:38:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
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فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
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این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو کاری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما افسانه‌ی فرخی زنده ماند. غزل‌های عاشقانه‌ی او میان مردم زمزمه می‌شد بی‌آنکه اغلب بدانند از کیست. برخی از بیت‌هایش به عنوان شاهدِ مثال بارها به‌کار رفته است که اغلب فکر می‌کنند بیتی است از شاعری کهن.&lt;br /&gt;
باید چهل سال می‌گذشت تا در انقلابی و در نظامی که فرخی اساسا فکرش را نکرده بود و شاید با برخی مظاهرش مخالف بود نامش زنده شود، و نه‌تنها نامش که نخستین بار ادبیات سیاسیش در مقیاس‌های وسیع در جامعه‌ی انقلابی به‌کار رود و آن آوای فرو خورده و منکوب شده به گوش سه نسل بعد برسد که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
توده را با جنگ صنفی آشنا باید نمود...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن زمان که بنهادم سر به‌پای آزادی...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اگر خدای به من فرصتی دهد یکروز&lt;br /&gt;
کشم ز مرتجعین انتقام آزادی...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رساتر چون شود این ناله‌ها فریاد می‌گردد...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او مغرور به آینده‌ئی که خواهد آمد و انقلابی که درخواهد گرفت، زندگی خود را فدای فردا می‌خواست و علیرغم همه‌ی ضعف‌های انسانیش این نقش را تا به‌آخر ادامه داد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;محمد علی سپانلو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(ادامه‌ی تایپ در حال انجام است)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T17:27:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو کاری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(ادامه‌ی تایپ در حال انجام است)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T17:25:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو کاری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(ادامه‌ی تایپ در حال انجام است)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T17:23:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو اری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T17:21:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو اری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(ادامه‌ی تایپ در حال انجام است)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T17:13:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو اری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او در سلول‌های تاریک و نمناکش دانسته بود که ارتجاع دست از سرش برنخواهد داشت. سرنوشت صدها شکنجه دیده و گم و گور شده را مرتب به چشمش می‌کشیدند. و او در میان راندگان و منحرفان اجتماع می‌سرود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جوهرم هست و بُرش دارم و ماندم به غلاف &lt;br /&gt;
پیش دشمن سپر افکندن من هست محال.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
زندگی را چون مرگ تدریجی ادامه می‌دهد، و ماه را در لحظه‌های نادری که به هوای آزاد می‌رسدبه‌بزم خیالی خود دعوت می‌کند و با افسانه شیرین خود را به خواب می‌سپارد. شعر می‌گوید و نومیدانه ، در اجتماع کر‌ها، از اصول حیات داد سخن می‌دهد. بدین طریق چیزی در درون فرخی درهم شکسته است، یک چیز جوان و خلاق. در بهار1318 زمزمه‌ی عفو عمومی به‌مناسبت ازدواج ولیعهد در گرفته. فرخی امید کوچکی به‌رهایی دارد اما بیشتر از آن طلب مرگ می‌کند. فرصت باقیمانده فقط برای این است که محیط مردگان به سرگذشت او آگاه شود، والا آن شعله‌ی درونی دیگر خاموش شده است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گر سواران را مجال بازدید و دیدنیست&lt;br /&gt;
باز گرد ای عید از زندان که ما را عید نیست&lt;br /&gt;
سر به‌زیر پر از آن دارم که دیگر این زمان&lt;br /&gt;
با من آن مرغ غزلخوانی که می‌نالید نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و در فراگرد تحول آینده خود را قانع می‌کند که((خرابی چون که از حد بگذرد آباد می‌گردد)). و از پس این کشمکش امروزی، برای بشر روز خوشی در کار است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آمپول هوا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
شهریور 1318، فرخی، با یک زیر شلواری چند شبی را در مستراح زندان گذرانده است. او بیمار و سخت خسته است. چهار نفر وارد سلول می‌شوند. فرخی، پزشک احمدی – جلاد تسبیح به‌دست رضاخان – را می‌شناسد. مرگ را پذیرفته است. اما عدم مقاومت  در برابر اوباش، وهنی است بر شاعر. درتاریکی متعفن، پیکاری خاموش و نومید در جریان است. دهان فرخی را گرفته‌اندو پزشک احمدی آمپول هوا را آماده کرده‌است. هوا در رگ‌های شاعر جاری می‌شود و او در تشنجی دردناک به خواب خفقان می‌رود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(ادامه‌ی تایپ در حال انجام است)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%81%D8%B1%D8%AE%DB%8C%D8%8C_%D8%B4%D8%A7%D8%B9%D8%B1_%D9%85%D8%B3%D9%84%DA%A9%DB%8C&amp;diff=5376</id>
		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T16:41:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو اری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
حالا فرخی زیر تیغ حکومت نشسته است، او یک گروگان است. محیط نیز تغییر کرده، محیط 1312 قبرستان کاملی است. همه روزن‌ها کور شده است. فرخی بی‌‌کار و بدهکار است. از همنشینی با او می‌ترسند. سایه‌ی ماموران تامینات همه جا در پی اوست. رئیس نظمیه( آیرم) به شاعر بیکار پیشنهاد گرفتن شغلی در اداره‌ی نظمیه می‌کند. قبول این شغل نشان خواهد داد که شاعر سر به‌راه آورده است. لازم نیست یاد‌آوری کنیم که پاسخ فرخی به این پیشنهاد چه بوده است. او در همان شبِ دهن‌دوختن انتخاب خود را کرده بود. .وخطاب به‌سرمایه‌داران چنین می‌سراید:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کهنه رند لات و لوتِ خانه بر دوشیم ما&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بهترین کار برای حفظ جان، سکوت بود. اما فرخی متوقف نماند. شعر‌های تازه‌اش دست به‌دست می‌گردد و همچنان از حق حیات ملت، بیداری توده‌های استثمار شده و انقلاب خونین می‌نویسد.&lt;br /&gt;
پس از رد پیشنهاد، فرخی از نگاه حکومتیان مرده حساب می‌شود، حکومت نمی‌خواهد رسما تضمین خود را نقض کند، اما بهانه بسیار است. فرخی به‌نام یک بدهکار به‌زندان می‌افتد. زندانِ ثبت آخرین فرصتی است که به شعر داده‌اند و چون او همچنان بر مواضع خود پا می‌فشارد و زندانیان حکوکت ((ذات اقدس)) را تبلیغ می‌کند، زندان‌ها امتداد می‌یابند... به شهربانی و حبس تاریک قصر. فرخی خودکشی می‌کند، و چون نجاتش می‌دهند شعری را که به‌نام خداحافظی سروده به پرونده‌ی ((اسائه ادب به مقام سلطنت)) می‌افزایند.&lt;br /&gt;
شاعر در محاکمه‌ی فرمایشی‌ سکوت می‌کند((قضاوت نهایی با ملت است)). او حاضر به سازش نیست. تقریبا مقارن با همین تاریخ، بهار از تبعیدگاهش در همدان پیشنهاد تقدیم قصیده‌ی  مدحیه وتقاضای عفو در حضور ذات اقدس را می‌پذیرد و جان به‌در می‌برد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از دست پافشاری خود فرخی افتاد&lt;br /&gt;
در ورطه‌ای که هیچ امید خلاص نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;(ادامه‌ی تایپ در حال انجام است)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T15:45:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-082.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-085.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو اری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sadeghsadeghi</name></author>
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		<title>فرخی، شاعر مسلکی</title>
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		<updated>2010-07-11T15:36:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sadeghsadeghi: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Image:3-080.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-081.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۱]]&lt;br /&gt;
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[[Image:3-083.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-084.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:3-086.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-087.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:3-088.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳ صفحه ۸۸]]&lt;br /&gt;
{(درحال تایپ}}&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فرخی، شاعر مسلکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رستاخیز، چهل سال پس از مرگ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده فرخی، شاعر مسلکی&lt;br /&gt;
زستاخیز، چهل سال پس از مرگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این روزها  نوبت فرخی یزدی است. او احیاء شده است، در ترانه‌ها، در سرودهای انقلابی، در شاهد مثال‌ها که سخنگویان می‌آورند. چه کسی فکر می‌کرد شعرهای شاعر مقتول به‌اقتضای چنین روزگاری پاسخ دهد؟ حتی پس از گشایش شهریور سال بیست هم فرخی این‌چنین مطرح نشد. از او، از سلوک اجتماعی و از سرنوشت دردناکش نوشتند، اما پنداری((ادبیات سیاسی)) او زمانه‌ئی مناسب‌تر می‌جست. و اکنون فرخی چهل سال پس از مرگش رستاخیز خود را به‌چشم می‌بیند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی نیز چون عارف و عشقی و بهار فرزند انقلاب مشروطه است. اما او برشاخه‌ای دیگر رسته است. در اِزای افکار لیبرالی معاصرانش، فرخی از چشمه‌ی تفکر سوسیالیستی نوشیده است، گرچه معرفت او خام است. اما شاعر شکفتگی شعرش بدان مدیون است. نیز در اثر اوست که ما نخستین بار از فرهنگ اصطلاحات و تعابیری که سال‌ها بعد ادبیات سیاسی چپ را انباشت نشانه‌ها می‌بینیم. فرخی همپای بنیان‌گذاری حزب عدالت به این اصطلاحات رسید،  آن‌گاه که نثر سیاسی و مسلکی رسول‌زاده، یا رسالات سلطان‌زاده و نمایشنامه‌های گریگور یقیکیان آغاز به ساختمان یک فرهنگ سیاسی مسلکی کرده بود.&lt;br /&gt;
با این همه توانایی فرخی در صورت‌های تغزلی و نیز عشق عمومیش به وطن و آزادی به‌او جنبه‌ی ((شاعر ملی)) داده است. و از این لحاظ با ناظم حکمت شاعر ترک قابل قیاس است که مخالفانش هم شعر او را می‌خواندند و از آن لذت می‌بردند.&lt;br /&gt;
(( حسین مکی)) جامع دیوان فرخی می‌نویسد: (( فرخی اقلا دوازده سال دیر کشته و شهید شده است)) با این حال، همین دوازده سال فرصتی است برای بازیافت و آزمون آن نشانه‌ها که برشمردیم. سالی که به قول راوی حکم مرگ فرخی باید اجرا می‌شد برابر 1306 است. حیدرخان و خیابانی کشته شده‌اند، عشقی به گلوله‌ی مزدوران نظمیه از پای در‌آمده، عارف به تبعید خفقان بار خود افتاده، بهار در زندان درس مدارا می‌آموزد، دهخدا یک سر به‌کار تحقیق سرگرم است. تحقیق در آثار ازمنه‌ی کهن و عصر گرد گرفتن از برق‌های عصر برق آغاز شده‌است.سال‌هایی که جنبش کم شمار اما بسیار موثر و متنفذ چپ در ایران بکلی درهم شکسته است. تخمی که در بنیان دوران انقلابی اجتماعیون-عامیون، حزب عدالت، کنگره‌ی انزلی و اتحادیه‌های کوچک کارگری کاشته بودند، در این سال‌ها مورد ایلغار وحشتناکی قرار گرفت؛ باغچه‌ای سوخته و بی‌منظر از آن باقی ماند، یاران یا گریختند یا توبه کردند یا کشته شدند. باید چند سالی می‌گذشت تا گروه 53 نفر تقریبا از صفر آغاز کنند، اما فرخی با پای خود به‌دامگاه باز می‌گردد، نه بی‌نشان می‌شود نه نه ساکت، نه به زیر زمین می‌رود. پس در واقع دوازده سالی زیادی عمر می‌کند که البته این را مدیون واپسین تضاد‌های نیروهای داخلی و خارجی است. فرخی تنها می‌ماند، تنها می‌جنگد و حتی ( پس از پیدایش گروه 53 نفر) تنها می‌میرد.&lt;br /&gt;
شعر‌های او دقیقا نمایشگر شخصیت اوست که هرگز تزلزل نمی‌پذیرد. فرخی از آخرین بازماندگان آن سلاله بود که برزمین موطن خویش پای افشردند. اوچندسالی دیگر هم غریب و بی‌یاور. چون آخرین جنگجوی قبیله‌ی آپاچی، مقاومت کرد. راستی را که سزاوار بود در زندان شهربانی به سال 1318. به نعش خفه شده‌ی او همچون بازمانده‌ی یک تیره‌ی منقرض یا موجودات کرات دیگر نگاه کنند. او به‌نام یک وظیفه به‌نام وفاداری به عقیده(نسبت به عقیده با وفا خواهم بود) چنین زیست، اما حتما به‌سرنوشت محتوم خود واقف بود که می‌گفت:&lt;br /&gt;
باید از اول بشوید دست از حق حیات&lt;br /&gt;
در محیط مردگان هرکس اقامت می‌کند.&lt;br /&gt;
در بهار جوانی، به بوی مشروطه، شهرستان دورافتاده‌ی یزد را پاریس عهد انقلاب می‌انگارد و حکمران را چنان مورد عتاب قرار می‌دهد که دستور می‌دهند دهانش را با نخ و سوزن بدوزند. و به‌زندانش بیندازند. اما شاعر متنبه نمی‌شود، حس وابستگی او به نهضتی که پا گرفته قوی‌تر است:&lt;br /&gt;
آزادی ایران که درختی است کهن‌سال&lt;br /&gt;
ما شاخه‌ی نورسته آن کهنه درختیم&lt;br /&gt;
پس شاعر به سواد اعظم متوسل می‌شود. به‌تهران می‌آید که اگر شبکه‌ی بی روحی از مشروطیت هم‌مانده باشد در همین‌جاست، و چون در درونش جوشش‌های پیکار هست(دل زمزمه‌های انقلابی دارد) به‌کار روزنامه نویسی می‌پردازد. یک مسابقه‌بزرگ با زمان، با زمان محکم شدن قید‌ها و فرا رسیدن مرگ.&lt;br /&gt;
این مسابقه از سال 1300 آغاز می‌شود، آغاز روزنامه‌ی طوفان به‌مدیریت فرخی یزدی کار در روزنامه مترادف است با آغاز یک دیکتاتوری که بقایای امید را بر اساس برنامه‌ی مرتبی جارو خواهد کرد. فرخی که به‌قول خود نمی‌خواهد (( تماشاچی روزگار بهتر)) باشد، و چون صاحب عقیده است، و چون نجات وطن را در گرو آگاهی زحمتکشان می‌داند، ناچار با قلمش در کار‌ها درگیر می‌شود. پس آن‌جا که عارف و عشقی تمام می‌کنند، در واقع فرخی آغاز می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزادی و عدالت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما اگر درونمایه‌ی اساسی شاعران مشروطه((آزادی)) است، مایه‌ی اصلی فرخی((عدالت)) است و این نه یک مفهوم اخلاقی است، بل اشاره‌ای به‌یک برنامه‌ی اجتماعی دارد. اساسا در ادبیات دو مفهوم لیبرالیسم و سوسیالیسم در کلمات آزادی و عدالت متراکم یا نمادی شده است. اما در کنار این مفهوم موضوعات دائمی شعر مشروطه به زندگی ادامه می‌دهد: عشق به وطن و آزادی و تنفر از طبقات و اقشار بهره‌کش( مالکان، سران عشایر، زعمای مذهبی، سیاست بازان) که با تعابیر ویژه‌ی فرخی بیان می‌شود. او عوامل استثمار محیط را می‌کوبد: کارفرما در برابر کارگر، ارباب یا سردار در برابر دهقان، نیز مبارزه‌ی علیه خرافاتی که روغن چراغ حکومت‌را تامین کرده است. و اینک فهرست اصطلاحات فرخی است: منفعت صنفی، زحمتکشان، رنجبر،انقلاب توده‌ئی، صلح جهانی و... او ((نکات طوفانی)) را در ((ستاره‌ی شرق)) بازگو می‌کند.&lt;br /&gt;
روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان روزنامه‌ی طوفان جهت ‌گیری مترقی و در عین حال کم نوسانی را در میان مطبوعات عصر نشان می‌دهد. دراین‌جا از احساساتی شدن‌های قرن بیستم (روزنامه‌ی عشقی) یا از خوشمزگی‌های کلی و عام نسیم شمال ( روزنامه‌ی اشرف‌الدین حسینی) یا از ملاحظات سیاسی و محافظه‌کارانه‌ی نوبهار( روزنامه‌ی محمدتقی بهار) چنان خبری نیست. مبارزه‌ی فرخی خط مسلکی دارد، هرچندخام. پیکان این مبارزه علیه سردار سپه نشانه می‌گیرد. فرخی می‌نویسد: (( دنیای ما ناپلئون و نادر نمی‌پروراند)) و به‌روشنی آینده‌ی تاریکی را پیشگوئی می‌کند: (( همین که از چندی قبل زمزمه‌ی حکومت قدرت بلند شد ما یقین کردیم که برای آتیه‌ی این ملت بیهوش و حواس بدبختی‌های تازه‌ئی آماده خواهد شد)).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اما چگونه است که علیرغم توقیف‌های مکرر طوفان، فرخی در گذر آن سال‌ها زنده می‌ماند؟ نخست این‌که هنوز در هیات حاکمه تضاد وجود دارد، کابینه ائتلافی است. همچنان که خطاب فرخی اغلب به‌وزرای سوسیالیست است. ثالثا در تسویه حسابی که به‌نام جمهوری خواهی پیش آمد، فرخی همان اقبال عارف را داشته است. او نیز به ‌نام ترقی‌خواهی نمی‌توانست مخالفت اصولی با جمهوری داشته باشد. همه‌ی این‌ها فیصله یافتن کارش را به سال‌ها بعد می‌اندازد. دستگاه هم فکر می‌کند خواهد توانست به‌نوعی او را به‌کار بگیرد و سرش را جایی بند کند، زیرا که هنوز آن دوران نرسیده که حکومت بهترین طرز مواجهه با مخالفانرا، نه فرضیه، بلکه سرکوب قطعی آنان بداند. فرخی که (( طرفدار بلشویک‌ها)) شناخته شده در رژیمی که به پیوستگی با انگلستان شده است اما در آغاز کارش روابط حسنه‌ای با شوروی نوپا دارد، عامل به‌معنایی خواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فال انقلاب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از این‌روست که ((طوفان)) را می‌بندند اما به‌فرخی امکان می‌دهند که به‌عنوان یکی از دو نماینده‌ی اقلیت در مجلس شورای اسلامی حضور یابد. شاید فرخی نیز می‌پندارد که می‌تواند از این کرسی میراث مبارزانی مدرس و مصدق را ادامه دهد. رباعیاتش که اضطراب او را به‌هنگام رای شماری نشان می‌دهد، حاکی است که چه قدر موضوع را جدی گرفته بود.&lt;br /&gt;
در همین ایام است، و در آخرین پرده‌های نمایش، که فرخی به‌نام نماینده‌‌ی مطبوعات ایران از سوی دولت اجازه می‌یابد که در جشن دهمین سالگرد انقلاب اکتبر شرکت کند. این‌بار فرخی شنیده‌ها را با دیده‌ها می‌سنجد. شور عظیم سازندگی جمهوری جوان درآن ایام برهر ناظر بی‌طرفی تاثیر می‌نهاد، چه برسد به فرخی که خود شورها در سر داشت و خواب‌ها برای کشورش می‌دید. و برای آن ((فال انقلاب)) می‌گرفت. او طرفدار انقلاب جهانی است:&lt;br /&gt;
دارند در انظار ملل حق حیات&lt;br /&gt;
آن قوم که انقلابِ خونین کردند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او به مسلک خود اعتقادی لایزال دارد:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
انگشت قضانامه‌ی گیتی چو ورق زد&lt;br /&gt;
سر دفتر آن مسلک برجسته‌ی ما بود.&lt;br /&gt;
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اما فال، نیک درنمی‌آید. تعادل نیروها به‌سمت دیگری متمایل است. جمهوری جوان آشکارا از دخالت در سرنوشت نیروهای طرفدار خویش درمشرق‌زمین سر باز می‌زند. بازی دموکراسی هم به‌پایان می‌رسد و روزنامه‌نویسی هم. ( تا قلم نگردد آزاد، از قلم نمی‌کنم یاد). فرخی به‌تجربه‌ی عینی دریافته است که چگونه پارلمان و بنیاد‌های مشروطیت پوک و تهی شده،  ومی‌بیند که در مطبوعات حتی کلمه‌ی ((کارگر)) نیز سانسور می‌شود. سر‌انجام از دست نمایندگان حکومتی در مجلس کتک می‌خورد و به عنوان نداشتن امنیت جانی مجلس را ترک می‌کند با این نتیجه گیری قهری که:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ز((انتخاب)) چو اری نمی‌رود از پیش&lt;br /&gt;
به پورِ کاوه بگو فکر((انقلاب ))کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و پیش از جدائی قطعی از یک زندگی متزلزل بار دیگر بر عقیده‌ی خود تاکید می‌کند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابنای بشر که زاده‌ی بوالبشرند&lt;br /&gt;
آن توده‌ی اصل زارع و کارگرند&lt;br /&gt;
صنف دگری معاونند آن‌ها را&lt;br /&gt;
باقی همه جمع فرعی و مفت خورند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرخی بار دیگر بار سفر می‌بندد و پنهانی به مسکو و از آنجا به اروپا می‌رود.گویا در مجله‌ی ((پیکار)) علیه حکومت استبداد می‌نویسد. با فقر و نداری سر می‌کند. وسار انجام فریب وزیر رضاشاهی ((تیمورتاش)) را می‌خورد. او مثل ماهی که به‌آب نیازمند است به هوای میهنی نیاز دراد. از تیمورتاش تامین جانی ی‌گیرد و به ایران باز می‌گردد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شاعر زیر تیغ حکومت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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